Friday, June 26, 2009

एसपी के बहाने

मैं कभी एसपी सिंह से आमने-सामने नहीं मिला। लेकिन दूरदर्शन पर आजतक के 20 मिनट के बुलेटिन से काफी पहले उनके नाम और चेहरे से वाकिफ हो चुका था और बहुत हद तक उनका प्रशंसक भी। पत्रिकाओं और अखबारों में छपने वाले उनके लेखों ने बताया कि वे एक बड़े पत्रकार हैं और उनके लेखों के समाजवादी रुझान ने मुझे उनका मुरीद बनाया। जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की संस्तुतियों को लागू किया तो पूरे देश में बड़ा हाय-तौबा मचा। मंडल आयोग की उस तपिश में बरसों तक कइयों की विचारधारा और कइयों का असली चेहरा झुलसता रहा। टीवी का चलन नहीं था और अखबारों में भी ज्यादातर मंडल का विरोध ही दिखता था। कभी खुल्लमखुल्ला तो कहीं लुका-छुपा के। उन्हीं दिनों एसपी का एक करारा लेख किसी पत्रिका (शायद इंडिया टुडे) में पढ़ा। पिछड़ों को कोसने वालों पर सीधा प्रहार करते हुए एसपी सिंह ने लिखा था कि बराबरी और समता की बात करने वाले अगड़ी जाति के लोग पिछड़ों पर जातिवादी होने का ठप्पा ऐसे लगाते हैं गोया सवर्ण तो जातिवादी होते ही नहीं। बड़ी बेबाकी से बात कही गयी थी और वह दिल को छू गयी। सोचा था कभी मौका मिला तो सामाजिक न्याय और समाजवाद के सवाल पर एसपी सिंह से जरूर बात करुंगा। लेकिन इस बात का बहुत अफसोस है कि ऐसा नहीं हो सका। उनके दौर का होकर भी उनसे मिल नहीं सका।
लेकिन यह सोचकर मन को सांत्वना मिलती है कि जिन लोगों ने एसपी से पत्रकारिता सीखी, उनके साथ रहकर काम किया, उनके सहयोगी रहे या फिर शिष्य, उन्होंने ही एसपी के व्यक्तित्व से कौन सी प्रेरणा ली? कहां रहा बेलौस होकर सच को सामने रखने का माद्दा? कहां रही पत्रकारिता को बुनियादी सवालों से जोड़ने की अकुलाहट? कहां रही पत्रकारिता की बनी-बनायी लीक को छोड़कर एक नई राह अपनाने की कोशिश? ये वो सवाल हैं, जिनका जवाब ढूंढ़ने की कोशिश ही मन को ये राहत देती है कि चलो हम नही मिले तो क्या हुआ। जो मिले, उन्होंने ही क्या कर लिया।

Thursday, June 25, 2009

अच्छे कल के लिए जरूरी है आपातकाल की याद

तब गुलामी थी और इंग्लैंड में विंस्टन चर्चिल जैसा अकड़ू प्रधानमंत्री था। चर्चिल ने भारतीयों की आजादी की मांग को यह कहकर नकार दिया कि अगर भारत को आजाद कर दिया गया तो भारतीय आपस में लड़कर ही मर जाएंगे। तब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े शिखर पुरुष महात्मा गांधी ने कहा कि आजाद होकर हम चाहे मरें या जीयें, बस आप हमारा पिंड छोड़ दो। गांधी को अपने देश के व्यक्तित्व और देशवासियों की मानसिकता पर पूरा भरोसा था। लेकिन तीन दशक बाद उस भरोसे की बलि चढ़ाने की कोशिश उस इंदिरा गांधी की दिमाग से निकली, जो गांधी के सबसे करीबी और राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाने वाले जवाहरलाल नेहरू की पुत्री थीं। 25-26 जून 1975 की आधी रात को जब सारा देश सो रहा था, तब लोकतंत्र को सदा के लिए सुलाने की कोशिश हुई। समाज के आखिरी आदमी के हितों को ताक पर रख दिया गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण समेत विपक्ष के सारे नेताओं ने रातों-रात खुद को जेल की चारदीवारी के भीतर पाया। जिसने भी इंदिरा गांधी की करनी से थोड़ी भी नाइत्तफाकी रखी, वो सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया। चाहे वो कभी इंदिरा गांधी के खासमखास रहे चंद्रशेखर रहे हों या फिर हिंदुस्तान के तकरीबन सवा लाख लोग। ईसा मसीह को एक बार सूली पर चढ़ाया गया था, अपने यहां लोकतंत्र तो पूरे 635 दिनों तक सूली पर लटका रहा।
अब ये सवाल उठ सकता है कि 34 साल पुरानी लकीर पीटने का क्या मतलब है। आज देश चहुमुखी विकास का मुंह देख रहा है, जैसा कि सरकारी आंकड़े और सरकार के लोग ढिंढोरा पीटते हैं। विकास, तरक्की और चकाचौंध की इस दीवाली में आपातकाल की उदासी बहुतों को ऐसा ही लग सकता है, जैसे किसी ने उनकी खीर में नीबू निंचोड़ दिया हो। लेकिन आपातकाल की याद इस बात की तस्दीक कराने के लिए काफी है कि यह देश सत्ता के हुक्मरानों को अपने ठेंगे के नीचे रखने का माद्दा रखता है। लोकतंत्र में भले ही नव राजा-रानियों की संतानें आप पुष्पित-पल्लवित हो रही हैं लेकिन आखिरी आदमी की आवाज को नकारना आसान नहीं होगा। इसीलिए जिस दौर में सरकारें पूंजी की प्रवक्ता बनने में भी अपनी खुशकिस्मती समझ रही हैं, आपातकाल और उसके बाद इंदिरा गांधी का हश्र यह बताने के लिए काफी है कि लोकतांत्रिक मूल्यों और आखिरी आदमी की वेदना और संवेदना से खिलवाड़ मत करो। अभी तो 34 साल हुए हैं, जबकि 3400 साल बाद भी आपातकाल के खिलाफ उठी 34 साल पुरानी आवाज ऐसे ही गूंजती रहेगी।

Saturday, June 6, 2009

किन महिलाओं के लिए महिला आरक्षण ?

शरद यादव का मजाक बनना था, बना। निंदा होनी थी, हुई। महिला आरक्षण पर संसद में उनकी राय ने कइयों की कनपटी के नीचे एक आग सुलगा दी। आखिर चिंगारी भी तो दमदार थी। महिला आरक्षण पर संसद में जनता दल (एकीकृत) के नेता ने कहा कि महिला आरक्षण विधेयक उन्हें मौजूदा स्वरूप में मंजूर नहीं है। उनके पास संसद में दलबल भले ना हो लेकिन जैसे-तैसे यह विधेयक पास हो गया तो वह सदन में ही जहर खाकर जान दे देंगे-सुकरात की तरह। फिर तो बवाल मचना ही था। मच गया लेकिन ठंडे दिमाग और बड़े दिल के साथ कुछ सोचने के लिए शरद यादव ने कुछ सुलगते सवाल भी छोड़ दिये हैं।
पहला सवाल यह है कि महिलाओं को आरक्षण का मतलब क्या है? एक वाक्य में कहा जाए तो जवाब होगा- महिलाओं की बेहतरी, संसदीय लोकतंत्र में उनकी मजबूत भागीदारी और उनका सशक्तीकरण। लेकिन इस जवाब में ही एक दूसरा सवाल भी छुपा है कि किन महिलाओं का सशक्तीकरण, किनकी भागीदारी और किनकी बेहतरी? जाहिर तौर पर इस सवाल का जवाब उन महिलाओं के भीतर खोजा जाएगा, जो उपेक्षित-वंचित तबके से आती हैं। जिनकी पूरी जिंदगी पिछड़ा और नारी होने की दो पाटों के बीच पीसती रही है। जो पांच कोस जाकर पीने का पानी लेकर घर आती हैं। जिसके पास इतनी सामर्थ्य नहीं होती कि पति और बच्चों के साथ दो जून का भर पेट खाना खा सके। जो हर शाम पेट पर पुराना कपड़ा बांधकर सोने को अभिशप्त है। अब आप बताइए कि क्या महिला आरक्षण की कामधेनु उस दरवाजे पर नहीं बंधनी चाहिए, जिसे वाकई जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की दरकार है? मन का दुराग्रह निकाल कर देखा जाए तो इस सवाल पर शरद यादव आपको सौ फीसदी सही दिखेंगे। गुजराल के समय में अपनी ही सरकार और अपने ही प्रधानमंत्री से वह दो दो हाथ संसद में ही कर चुके हैं।
अगर मौजूदा स्वरूप में ही महिला आरक्षण विधेयक पास हो गया तो भारतीय लोकतंत्र के नए राजवंशियों का ही कब्जा उन सीटों पर होगा, जो महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। जो ताकतवर राजनेता हैं, वे तो सामान्य सीटों पर चुनाव लड़ेंगे ही, आप देख लीजिएगा कि अपनी पत्नियों, बहुओं, बेटियों को वो महिला आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़वाएंगे। यानी चित भी मेरी, पट भी मेरी और अंटी मेरी जेब में।
सत्ता की चाहत और राजनीति में खुद को बनाए रखने की अंतहीन लालसा ने शरद यादव को उस भाजपा के साथ बीते ग्यारह साल से खड़ा कर रखा है, जो महिला आरक्षण पर कांग्रेस के सुर में सुर मिलाती है। अब भाजपा के साथ आकर अपनी समाजवादी कमीज को शरद ने थोड़ी धुमिल भले कर दी है लेकिन समाजवाद का पुराना सत्व उनमें बाकी है। वही सत्व उन्हें कभी अपने प्रधानमंत्री गुजराल से भिड़ जाने की ताकत देता है तो अब मनमोहन सरकार से टकराने की। एक ईमानदार सवाल उठाकर शरद यादव ने बधाई पाने का काम किया है।

विचित्रमणि

Friday, August 29, 2008

कोसी कितनी दोषी?

(बिहार में बाढ़ पर ये छोटा सा आलेख एक नवोदित लेखक विकास कुमार सिंह का है। अपनी पीड़ा, वेदना और बिहार के जरिये इंसानी लोभ को उन्होंने उकेरने की कोशिश की है।)
कोसी की गिनती अल्हड़ और खुद ही अपनी लकीर खींचने वाली नदी के रूप में होती है। कब, कहां और कैसे वो अपना रास्ता बदल दे, ये कोई नहीं जानता। शायद वह नदी ये संदेश देना चाहती है कि प्रकृति को अपना काम करने देने हो और खुद को उसके मुताबिक ही ढालकर जीना सीखो। प्रकृति का सहचर बनो, उस पर हावी होने की कोशिश मत करो। लेकिन मनुष्य का स्वभाव ही हर जगह अपनी हेठी और खुद को बड़ा साबित करने का बन चुका है। बिहार में प्रलय का दूसरा नाम बनकर जो बाढ़ आई है, उसने एक बार फिर कोसी को चर्चा का केंद्र बिंदु भी बना दिया है। कोसी ने पूरी तरह अपनी राह बदल ली। इससे बाढ़ और प्रलयंकारी हो गयी। उसकी छवि एक बेहद आवारा नदी की बन गयी और उसके पाश में बिहार के कमोबेश दस जिले जिंदगी की पनाह मांग रहे हैं।
कोसी पर बना भीमनगर का बांध अतिरिक्त जल का दबाव नहीं सह पाया और वह टूट गया। ऐसा बार बार कहा गया लेकिन क्या सच्चाई सिर्फ इतनी ही है। उस तटबंध में दरार और थोडा बहुत पानी रिसना तो अगस्त के बिल्कुल शुरु में ही शुरू हो गया था। लेकिन तब तक उस पर ध्यान नहीं दिया गया, जब तक हालात हाथ से निकल नहीं गया। १५ अगस्त को जब पूरा देश आजादी की सालगिरह मना रहा था, तब उत्तर बिहार के बाढ़ प्रभावित लोगों को साफ दिखने लगा था कि मौत उन्हें गुलाम बनाने आ रही है। लेकिन वो स्थिति नहीं बनती, अगर तटबंध पर पहले ही ध्यान दिया गया होता।
अब सवाल है कि आगे क्या होगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया, लाखों टन अनाज पहुंच गये और सेंटर से एक हजार करोड रूपये भी। इतने रूपये देखकर अनायास वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ की किताब एवरीबडी लव ए गुड ड्राउट की याद आती है, जिसमें बताया गया है कि कैसे नेता और अफसर बाढ़ और सूखे का इंतजार करते हैं ताकि राहत के नाम पर मिला पैसा उनकी अंटी में चला जाए। क्या बिहार के मामले में भी यही नहीं होगा? महीने दो महीने में लोग भूल जाएंगे कि कुछ समय पहले ही बिहार विनाश के कगार पर बैठा था।
आज जो अधिकारी कोसी को दोषी ठहरा रहे हैं, सच पूछिये तो मन ही मन वो अतिशय प्रसन्न होंगे क्योंकि राहत फंड से उनकी तमाम चाहत पूरी होगी। आखिर इस देश को किसी नदी की बनती बिगड़ी धारा नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की आवारा रफ्तार ही बर्बाद कर रही है।

Monday, August 25, 2008

कॉर्पोरेट नागरिकता जिंदाबाद!

विलासराव देशमुख हमेशा मुस्कुराते रहते हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है बल्कि अच्छा है कि सेहत दुरुस्त रहे। क्या पता, ६३ साल की उम्र में भी नौजवानों की तरह चमकते दमकते रहने के पीछे एक बड़ा कारण ये भी हो। उनकी मुस्कुराहट कुछ इंच और बढ़ गयी है, जबसे सुना है कि रतन टाटा सिंगूर से अपनी नैनो प्रोजेक्ट को हटाने की चेतावनी दे चुके हैं। लगे हाथ महाराष्ट्र के महापराक्रमी मुख्यमंत्री ने कह दिया कि आइए टाटा, हम करते हैं आपका स्वागत। हम आपको देंगे जमीन। जरूर दीजिए जमीन लेकिन कीमत क्या होगी? करोड़ों का वारा न्यारा या फिर किसानों की मुसीबत? क्या ऐसा नहीं होगा कि सिंगूर के किसानों का दर्द अब विदर्भ के किसानों में गुणात्मक बढोत्तरी के साथ उभकर सामने आएगा?
आखिर महाराष्ट्र के विदर्भ में जमीन बिक रही है। किसानों की हालत खराब है और चिदंबरम साहब का ६० हजार करोड़ का महादान भी उनकी गाड़ी को पटरी पर ला नहीं पा रहा है। ऐसी खबर बार बार आती है कि नागपुर से अकोला के बीच कर्ज के मारे किसाने अपनी जमीन औने पौने दामों पर बेचने को तैयार हैं। वहां आलम ये है कि दस फीसदी लोग भी ऐसे नहीं हैं, जिन्हें भर पेट पौष्टिक भोजन मिलता हो। कमोबेश सभी परिवार कर्ज से दबे हैं और इसे सिर्फ कहावत मत समझिएगा बल्कि कड़वी सच्चाई है कि नमक रोटी पर उनका गुजारा चलता है और वो भी भर पेट नहीं मिलता। रोजगार गारंटी योजना को लेकर कांग्रेसी चारणवृंद जब तब राहुल गांधी की जयजयकार करते हैं और खुद कांग्रेस के युगपुरुष राहुल जी महाराज संसद में शशिकला और कलावती के बहाने विदर्भ और किसानों पर घड़ियाली आंसू बहा चुके हैं। बावजुद इसके विदर्भ के ज्यादातर इलाकों में रोजगार गांरटी योजना शुरु नहीं हो पायी है। अब ऐसे में जमीन बेचकर किसान से खेतिहर मजदूर और फिर मजदूर होते हुए भिखारी बनने या फिर खुदकुशी करने के अलावा उन किसानों की नियति में और क्या हो सकता है। लेकिन उन किसानों की वेदना से खुद को जोड़ने की सच्चे मन से किसी राजनेता ने क्या कोशिश की? करीब चार साल से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान देशमुख ने ही कहां कुछ सोचा। टाटा के लिए जाजम की तरह बिछने को बेताब मुख्यमंत्री बखूबी जानते हैं कि पैसा तो धनपशुओं से मिलेगा और आज राजनीति की सार्वभौमिक सच्चाई बन गया है अनाप शनाप पैसा।
हालांकि बुद्धदेव भट्टाचार्य जिस तरह टाटा को मनाने में लगे हैं, उससे लगता नहीं कि सिंगूर की नैनो महाराष्ट्र में सजने संवरने जा पाएगी। लेकिन देशमुख जी, घबराने की बात नहीं है। कोई दूसरा टाटा किसानों की जमीन खरीदने आ जाएगा और आप की सरकार करेगी बिचौलिये का काम। किसान गए भाड़ में, कॉर्पोरेट नागरिकता जिंदाबाद!

Sunday, August 24, 2008

कॉर्पोरेट नागरिक बनोगे!

तो सुना आपने, महान देशभक्त रतन टाटा क्या कह रहे हैं? हर अखबार का पहला पन्ना और उसकी कमोबेश पहली खबर उनकी इस धमकी से बनी थी कि बहुत हुआ, अब बर्दाश्त नहीं करेंगे और किसान नहीं माने तो वो सिंगूर को टा टा बोल देंगे। अब देश की नइय्या पार लगाने वाले रतन टाटा जी महाराज ने धमकाया या चेतावनी दी तो खुद को सर्वहारा का प्रतिनिधि बताने वाली पश्चिम बंगाल की सरकार सीधे शीर्षासन पर उतर आयी। दूसरी तरफ महाराष्ट्र से लेकर उत्तराखंड तक के मुख्यमंत्रियों ने टाटा को नयनों में बसा लिया और उनकी सिंगूर वाले प्रोजेक्ट को अपने सूबे में लगाने का न्यौता दे दिया। यानी लाल सलाम से लेकर दलाल सलाम के जरिये सरकार बचाने वाली कांग्रेस और पार्टी जरा हटके भाजपा तक टाटा के स्वागत में जाजम की तरह बिछ गये। आखिर कहीं तो सियासतदानों ने एकजूटता दिखाई। धन्य हैं।
होगी नेताओं के लिए ये चिंता की बात कि सिंगूर में किसानों के विरोध से टाटा दुखी हो गये और सि्गूर छोड़ने की उन्होंने धमकी दे दी। लेकिन असल चिंता कुछ और भी है। २१ अगस्त को कोलकाता में रटन टाटा ने कहा कि ये कोलकाता को तय करना है कि उसे अवांछित नागरिक चाहिए या अच्छा कॉर्पोरेट नागरिक। इशारों में रटन टाटा ने वामपंथियों को भी धमका दिया कि अगर लाल सरकार की पुलिस के होते हुए भी सिंगूर का उनका किला महफूज नहीं रहता तो फिर वो सरकार निकम्मी है। टाटा चाहें तो बुद्धदेव भट्टाचार्य को गरिया सकते हैं, हमको आपको दिखाने के लिए भी। लोगों के सामने तो मजनूं को लैला बुरा बोल ही देती है। लेकिन हम जिस समाज में जीते हैं, उसका मानस कौन तय करेगा? हमें कैसा नागरिक बनना है, वो कौन बताएगा? हम कैसा समाज हैं, इसका सर्टिफिकेट कौन देगा? हमें भारतीय नागरिक बनना है या टाटा जी का कॉर्पोरेट नागरिक, ये कौन तय करेगा? आखिर हम अपना नफा नुकसान देखने वाले एक बनिये के बताए रास्ते पर चलेंगे या फिर उस रास्ते पर दो डेग भरने की जहमत उठाएंगे, जिसे हमारे महान राष्ट्रपिता ने बनाया है?
किसानों की पीड़ा है कि कोलकाता से महज ४० किलोमीटर दूर सिंगूर में उनकी जमीन टाटा के लिए सरकार ने जबरन हथियाई। उनका ये भी कहना है कि वो जमीन उपजाऊ है और उस पर बाप दादा के जमाने से वो खेती करते आ रहे हैं। जमीन के मुआवजे से पांच लाख रुपये मिल ही गये तो उससे उनका क्या होगा। आखिर अपनी जड़ और जमीन से उखड़कर वो क्या करेंगे। यकीकन पहले वो किसान थे, फिर खेतिहर मजदूर बनेंगे और उसके बाद ठेठ मजदूर, जिनकी ना तो कोई जमीन होगी, ना सपनों का आसमान होगा। क्या टाटा के पांच लाख रुपल्ली से उनकी जिंदगी चल जाएगी? दूसरी बात ये है कि कॉर्पोरेट कल्चर के बाद कॉर्पोरेट नागरिक बनाने चले रतन टाटा ने जिन किसानों की जमीन ली, क्यों नहीं उन्हें अपनी कंपनी का शेयरधारक बना दिया। तब समझ में आता कि लेवल पर कॉर्पोरेट कल्चर बह रहा है और देश भी देखता कि उद्धारक का लिबास ओढ़े एक उद्योगपति मानवीय संवेदना से भी भरा है। आखिर गांधी ने ट्रस्टीशीप के सिद्धांत में इसी बात पर ही तो बल दिया था। क्यों नहीं सरकारें गांधी की बात को कबूल कर लेती हैं? आखिर ये देश गांधी के सपनों और संघर्षों से निकला है, टाटा और उनके इशारों पर ता ता थैया करने वाली सरकारों के कमाऊ खाऊ और खून पीऊ नीतियों से नहीं।
लिहाजा किसानों को कॉर्पोरेट नागरिक बनवाने निकले रतन टाटा को चाहिए कि पहले खुद एक साफ सुथरा नागरिक बनें। वो नागरिक, जिसकी आत्मा इस देश की रीढ़ माने जाने वाले किसानों का खून निचोड़कर खुश ना होती हो। तब वो अपना कॉर्पोरेट चलाएं। होंगे रतन टाटा बहुत बड़े देशभक्त लेकिन मैं ये मानने को तैयार नहीं कि किसानों से ज्यादा वो देश की बेहतरी कर सकते हैं या उसके बारे में सोच सकते हैं। इसीलिए सरकारों के लिए भी टाटा के बहाने ये एक चेतावनी ही है कि खेतिहर समाज के धीरज का वे ज्यादा इम्तिहान ना लें।

Monday, July 28, 2008

कुछ कहते हुए भी मौन प्रार्थना

धमाके हमारी नियति बनते जा रहे हैं। जिस तरह भ्रष्टाचार को हमने अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया है, उसी तरह बम धमाके भी धीरे धीरे हमारे मानस में छठे छमाहे होने वाले हादसे की तरह पैठ बनाते जा रहे हैं। कभी बनारस में हुआ, कभी मुंबई में तो कभी दिल्ली तो कभी हैदराबाद, मालेगांव, जयपुर, बैंगलोर, अहमदाबाद...बम धमाकों और मासूमों की लाश और बेबसी गिनते अनंत सवाल। पहले डर लगता था, अब वो डर एक ऐसी पीड़ा की शक्ल ले चुका है, जिसमें पोर दर पोर टूटना ही लिखा है। जैसे छोटे से घाव के रिसने पर कराहने वाला आदमी कैंसर का असह्य कष्ट झेलने लगता है। अहमदाबाद और बैंगलोर की वो पीड़ा हमारे समाज के उसी कैंसर से निकला है, जिसका इलाज करने की हमने जहमत ही नहीं उठायी। दुर्भाग्य ये है कि अभी भी खांसी जुकाम की दवा से उस मरीज को जिलाने की हसरत पाले हुए हैं। क्या ये सच नहीं है कि जैसे मुंबई, बनारस, दिल्ली और दूसरे बम धमाकों और उसमें खोयी जिंदगियों का गम अब हमारे जेहन में नहीं है, वैसे ही कल हम बैंगलोर और अहमदाबाद को भी भुला देंगे? वेदना की इस घड़ी में ये कहना मर्म पर चोट पहुंचाने वाला जरूर लग सकता है, लेकिन हम सब दो तीन दिन में अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेंगे। अहमदाबाद में सोनिया गांधी पहुंची, मनमोहन सिंह पहुंचे, नरेंद्र मोदी पहुंचे। दो चार दिन तक जाने-अनजाने नायकों का वहां जाना लगा हुआ है। सब रटी रटायी बात कर रहे हैं। भाजपा कांग्रेस को कोस रही है, कांग्रेस भाजपा को।
लेकिन हमारे समाज का मानस क्या सोचता है? मेरे एक मित्र, जिनकी रा और आईबी में काफी पैठ है, एक बार बता रहे थे कि मुंबई और दूसरी जगहों पर बम धमाके करने वाले कुछ आतंकवादियों से पूछा गया कि वो ऐसा क्यों करते हैं। तो जवाब आया कि २००२ के गुजरात दंगों का बदला लेने के लिए। लेकिन २००२ के दंगे तो नरेंद्र मोदी के राज में हुआ था, लिहाजा बदला तो गुजरात में लिया जाना चाहिए। लेकिन वहां तो धमाका होता नहीं। पकड़े गये एक आतंकवादी का कहना था कि अगर हमने गुजरात में कुछ किया तो मोदी एक एक कर मुसलमानों को मरवाना शुरु कर देंगे, जैसा कि छह साल पहले हुआ था। पूछने वाले अधिकारी का निष्कर्ष था कि मोदी का डर गुजरात को आतंक की आग से बचाए रखेगा। लेकिन अहमदाबाद में बहे खूनों ने उस निष्कर्ष को लहूलुहान कर दिया है। क्या इससे एक धुंधली तस्वीर ये नहीं बनती कि सिर्फ कड़ाई या चतुराई दिखाने से आतंकवाद दूर नहीं हो सकता। मोदी गुजरात के एक बड़े हिस्से को ये एहसास तो दिला सकते हैं कि उनके राज में कुछ नहीं होगा लेकिन अंदर से उनका साहस और खुफिया तंत्र भी सड़ा हुआ है।
हर धमाके के बाद एक सवाल ये भी उठता है कि आतंकवादियों को स्थानीय लोगों का प्रश्रय मिला था। बात सही है और जब ये सवाल उठता है तो उंगली स्थानीय मुसलमानों की तरफ ही उठती है। दंगों में वो भी बहुत कुछ गंवाते हैं लेकिन उनकी पीड़ा इस मामले में थोड़ी अलग होती है कि वो ना सिर्फ अपनों का जनाजा उठाते हैं, बल्कि सशंकित नजरों से देखे जाने का असहनीय बोझ भी वो उठाते हैं। बीस साल पहले भारत में जम्मू-कश्मीर को छोड़कर कोई भी इलाका आतंकवाद की वैसी चपेट में नहीं रहा, जैसा कि अब है। पंजाब, असम और उत्तर पूर्व की कुछ आतंकवादी गतिविधियां उन धमाकों से जुदा हैं, जो हर कुछ महीनों पर हमें भोगना पड़ता है। अगर ये मान भी लिया जाए कि आतंकवादी स्थानीय मुसलमानों को मजहब के नाम पर बरगलाते हैं तो भी वैसे माहौल के लिए क्या देश के कुछ स्वनाम धन्य बड़े नेता दोषी नहीं हैं? हिंदुस्तान में हिंदू-मुसलमान की लड़ाई काफी पुरानी है। अब धमाके होते हैं, पहले दंगे होते थे। जो रिकॉर्ड है, उसके मुताबिक पहला दंगा १७९२ या ९३ में होली के समय हुआ था और वो भी गुजरात के तटीय इलाके में। उसके बाद भी दंगे फसाद होते रहे, हिंदुओं और मुसलमानों में जब तब ठनती रही लेकिन उनकी ये लड़ाई कुछ वैसी ही थी, जैसे दो चचाजात भाइयों में होती है। जमीन जायदाद के मसले पर होने वाली छोटी मोटी लड़ाई, जो धीरे धीरे फिर से प्यार और मनुहार में बदल जाती है। लेकिन ६ दिसंबर १९९२ को अयोध्या में जो कुछ हुआ और मर्यादा के पुरुषोत्तम भगवान राम के नाम पर हुआ, उसने दिलों में दरार पैदा कर दिया। मंदिर और मस्जिद टूटे तो वो जुड सकते हैं लेकिन भरोसे वाला दिल दरक जाए तो फिर उसका जुड़ना मुश्किल हो जाता है। उस घटना के बाद से ही हिंदू मुसलमानों में एक तीक्ष्ण विभेदक दूरी बन गयी या बना दी गयी।
अब उसके लिए दोषी कौन है? बगैर किसी लाग लपेट के कहा जाए तो कांग्रेस और भाजपा। इन दोनो पार्टियों में भेद करना उतना ही मुश्किल है, जितना मुश्किल खुद भगवान राम के लिए बालि और सुग्रीव में भेद करना था। जिस तरह दोनो की शक्ल हू ब हू मिलती थी, वैसे ही कांग्रेस और बीजेपी भी हु ब हू मिलते हैं। नई सोच वाले नई उम्र के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अयोध्या में अनायास और नाहक राम जन्मभूमि का ताला खुलवा दिया और लाल कृष्ण आडवाणी की अगुवाई में बीजेपी के कारसेवकों (या संहारसेवकों) ने राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद का ढांचा गिरा दिया। मौनी बाबा बने रहने वाले कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव ने गुप चुप तरीके से भाजपा का साथ दिया। राव के बारे में यूं ही नहीं कहा जाता था कि धोती के नीचे वो आरएसएस का हाफ पैंट पहनते थे।
आपको लग रहा हो कि विषयांतर हो रहा है। कहां तो हम धमाके की बात कर रहे थे और कहां उस धमाके को भाजपा और कांग्रेस पर पटक रहे हैं। लेकिन ये बात हम इसलिए कर रहे हैं कि देश की दोनो मुख्य पार्टियों ने कभी जनमत को साफ सुथरा बनाने की कोशिश नहीं की। अगर धर्म के नाम पर विभाजन और वोट के लिए बांग्लादेश से घुसपैठ पर इन्होंने सुदृढ़ इच्छा शक्ति के साथ काम किया होता तो हर आए दिन आतंक की आग में झुलसने के लिए ये देश अभिशप्त नहीं होता। आखिर जब तक हमारे मन का आतंकवाद नहीं मरेगा, पोटा या सोंटा या गोली बारूद से आतंकवाद का खात्मा नहीं हो सकता। क्या हम इसके लिए तैयार हैं? अभी तो कुछ कहते हुए भी मौन प्रार्थना ही की जा सकती है।