<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-651389203414988846</id><updated>2011-07-08T07:21:28.233-07:00</updated><title type='text'>अलाव</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://alaaw.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://alaaw.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Bichitra Mani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04287910528808991198</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>15</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-651389203414988846.post-3683308398938513458</id><published>2009-12-28T12:41:00.000-08:00</published><updated>2009-12-28T12:42:56.107-08:00</updated><title type='text'>पोस्टर छाप पोलटिक्स</title><content type='html'>कुल जमा तीन जन थे। रात कमर तक घनी हो चुकी थी और ठंड की ठिठुरन में उनका हाल बहुत बुरा नहीं तो बुरा तो कहा ही जाएगा। एक आदमी सीढ़ी लगाकर डिवाइडर पर बने पोस्ट लैंप पर पोस्टर टांगने की कोशिश कर रहा था, दूसरा सीढ़ी संभाले हुए था और तीसरा इधर-उधर छिटके पोस्टरों को समेट रहा था। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पोस्टर थे, जिन पर काफी बड़े आकार में राहुल गांधी मुस्कुरा रहे थे। इधर उधर छिटके पोस्टरों में राहुल बाबा का एक पोस्टर डिवाइडर से नीचे सड़क पर आ गया था, जिसपर चिपकाने वाले की नजर शायद गयी नहीं। कांग्रेस का भविष्य तो इस देश की जनता बांचेगी लेकिन कांग्रेसी जिसे अपना भविष्य मानते हैं, उनका पोस्टर करीब-करीब आधी रात को आईटीओ के चौराहे पर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की तरफ जाने वाली सड़क पर अपना धुल-धुसरित भविष्य देख रहा था। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी यानी डीपीसीसी के जिस अधिकारी ने राहुल गांधी का पोस्टर लगवाने का ठेका उन तीन मजदूर सरीखे लोगों को दिया होगा, उसकी ड्यूटी तो आदेश और पैसा देकर ही खत्म हो गयी होगी। पोस्टर टांगने और चिपकाने वालों ने भी अपना कर्तव्य रात बारह बजे तक पूरा कर लिया होगा और सड़क पर मोटर गाड़ी में बैठे हमारे आप जैसे लोगों की नजर पड़ गयी तो कुछ रोज तक कांग्रेस के मुस्कुराते भविष्य को सड़क पर टंगा हुआ देख हम आप भी अपना फर्ज निभा लेंगे। उसमें कितनी खुशी, कितनी उदासी, राम जाने!&lt;br /&gt;लेकिन पोस्टर छाप पोलटिक्स में पोस्टर पर चेहरे और चेहरे के बखान में छपे दो शब्द ही कुछ चेहरों पर उदासी तो कुछ पर खुशियां बिखेर देते हैं। नौ साल पहले बैंगलोर में कांग्रेस का महाधिवेशन हुआ था। एक अखबार की रिपोर्टिंग के लिए मैं भी गया था। सेशन शुरु होने से एक दिन पहले होटल से कांग्रेस वाले उस जगह पर ले गये, जहां 21वीं सदी के कांग्रेस की रूप-रेखा तय होनी थी। वहां तमाम पोस्टर लगे थे। उनमें कहीं पर बेचारे नरसिम्हाराव नहीं थे, जो पांच साल तक कांग्रेस के अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री रहे और प्रधानमंत्री रहते हुए कभी जिनके पोस्टरो से देश की दीवारें ढंक गयी थीं -चार कदम सूरज की ओर। पांचवे कदम पर सूरज तो छोड़िये, जनता की तपिश ने ऐसा झुलसाया कि फिर कभी बेचारे उठ नहीं पाए। बेचारे सीताराम केसरी भी नहीं दिखे, जिन्होंने अध्यक्ष बनने के बाद पहले नरसिम्हा राव को निपटाना शुरु किया और अपने बारे में कहना शुरु किया कि कांग्रेस अध्यक्ष व्यक्ति नहीं, संस्था होता है। इतिहास चक्र में ये तो थोड़े छोटे स्तर के लोग हो जाएंगे, ताज्जुब तो तब हुआ जब किसी पोस्टर पर गांधी और नेहरू तक नहीं दिखे। वैसे क्या तो कांग्रेस और क्या कांग्रेस का पोस्टर, जिस पर गांधी ना हों। क्योंकि गांधी का पोस्टर तो लोगों के दिलों पर चिपका होता है और वो आस्था की ऊंचाइयों पर टंगा होता है। उनकी तो बात ही छोड़िये लेकिन नेहरू तो वंशवादी कांग्रेस के पितृ-पुरुष हैं, उनको भी कांग्रेसियों ने नहीं पूछा। बस इंदिरा, राजीव और सोनिया। पोस्टर छाप पोलटिक्स में 21वीं सदी का कांग्रेस उस बुनियाद को भी भूल गया, जिसने बीसवीं सदी में देश को आजादी दिलायी और संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली को आत्मसात किया।&lt;br /&gt;वैसे बचपन में भी ज्यादातर कांग्रेस के ही पोस्टर देखने को मिलते थे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा के चुनावों में इंदिरा गांधी के बड़े बड़े पोस्टर उनके मरने से पहले के भाषण के साथ जगह जगह चिपकाए हुए मिलते थे। अपने इलाके में तो कांग्रेस से ज्यादा समाजवादियों का असर हुआ करता था। हमारे यहां चंदौली से जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे वीरेंद्र सिंह का प्रचार करने वाली एक जीप आई थी। उस पर चिपके एक पोस्टर पर नारा लिखा था- बिल्ला-पोस्टर आई का, वोट वीरेंदर भाई का। आई यानी कांग्रेस आई। अब जिसके पास पैसा होगा, पोस्टर तो उसके ही दमदार होंगे ना। तभी तो कांग्रेस वालों के पोस्टर ज्यादा चमकीले दिखते हैं या फिर बाद में भाजपा वालों के दिखने लगे। वैसे उसी बचपने में अपने गांव में एक बार संघ परिवार का भी पोस्टर देखने का सौभाग्य मिला। उस पोस्टर पर भारत माता की तस्वीर बनी हुई थी और अगल-बगल में हेडगेवार और गोलवलकर की तस्वीर थी। वो दोनो चेहरे मेरे जैसे तेरह साल के एक बच्चे के लिए अनजाने थे। हाई स्कूल के मैदान में उनका कार्यक्रम था, जहां कार्यक्रम के कर्ता-धर्ता से मैंने पूछा कि ये लोग हैं कौन। उस महानुभाव को मुझ नासमझ बच्चे के अज्ञान पर बड़ा गुस्सा आया और उन्होंने भुनभुनाते हुए जो कुछ कहा, उसका सार यही था कि अगर ये दोनो नहीं होते, तो ये देश नहीं होता, आजादी नहीं होती वगैरह। सुनकर जेहन में सवाल उमड़ा कि जब देश इनके बल पर बना तो फिर गांधी-सुभाष-भगत सिंह क्या कर रहे थे? बाद में समझ में आया कि कुछ लोग पोस्टर पर ही देश भी बना देते हैं, हमारी आपकी आजादी भी सुरक्षित कर लेते हैं और उनका पूरा योगदान ही पोस्टर में सिमट कर रह जाता है। जय हो!&lt;br /&gt;वैसे पोस्टर लिखने का काम तो एक बार खुद को भी करना पड़ा। मजबूरी में नहीं, शौक से। बीएचयू के दिनों में डंकल और गैट के विरोध में जब समां बंधने लगा, तो मैं और मेरा रूम पार्टनर स्वदेशी जागरण मंच के लिए प्रचार करने लगे। अब कंप्यूटर पर टकटक करने से भले ही हाथ बिगड़ गया हो लेकिन तब अपनी हैंडराइटिंग बड़ी अच्छी थी। तो स्वदेशी अपनाने और देसी दिलो-दिमाग रखने वाले पोस्टर अपने हाथो से लिखकर हम दोनो चिपकाया करते थे। कभी बचपन में पढ़े राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियां ज्यादातर पोस्टरों पर हमारी भावनाओं को अभिव्यक्ति देतीं कि "गौरव की भाषा नई सीख, भिखमंगों की आवाज बदल। सिमटी बांहों को खोल गरुड़, उड़ने का अब अंदाज बदल। स्वाधीन मनुज की इच्छा से ऊंचे पहाड़ हिल सकते हैं। रोटी क्या वो अंबर वाले सारे सिंगार मिल सकते हैं।" उसी दौरान आरएसएस के तत्कालीन सर संघ चालकर राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भइया बीएचयू में आए। सिर्फ संघियों के साथ ही उनकी बैठक थी। मेरा भले वास्ता ना रहा हो, लेकिन मेरा रूम पार्टनर तो उस वक्त पक्का हाफ पैंटी था। स्वदेशी का प्रचार तो हम कर रहे थे लेकिन मेरे जेहन में एक सवाल छिड़ा रहता था कि संघ के वरदहस्त वाली बीजेपी में जे के जैन जैसा व्यक्ति राज्यसभा का सदस्य कैसे है, जिसका टीवी चैनल भारतीय मान्यताओं के खिलाफ दिखाता है? सोचा कि सवाल रज्जू भइया से ही पूछा जाना चाहिए। संघियों की उस बैठक में अपने दोस्त के साथ मैं भी चला गया। ब्रोचा होस्टल के सामने वाले मैदान में 25-30 लोगों के बीच रज्जू भइया ने स्वदेशी पर बड़ा ज्ञान दिया। मेरा मन तो मेरे सवाल में ही भटका हुआ था। जब वो चलने लगे तो मैंने सवाल दाग दिया-रज्जू भइया, स्वदेशी तो ठीक है लेकिन जेके जैन के बारे में क्या कहेंगे? उन्होंने मेरी तरफ देखा जैसे हंसों की उस पंगत में कौआ कहां से आ गया और चुपचाप मारुति में बैठकर चले गए। मैं खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगा और उस दिन से पोस्टरबाजी बंद।&lt;br /&gt;लेकिन उससे क्या होता है? पोस्टर पर पोलटिक्स चमकाने वाले तो मानेंगे नहीं। लेकिन वो नहीं जानते कि लोगों का दिल पोस्टरों से ज्यादा भावनाओं से जुड़ता है। गांधी, जेपी, वीपी....किन-किनका नाम लें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/651389203414988846-3683308398938513458?l=alaaw.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://alaaw.blogspot.com/feeds/3683308398938513458/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=651389203414988846&amp;postID=3683308398938513458' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/3683308398938513458'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/3683308398938513458'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://alaaw.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='पोस्टर छाप पोलटिक्स'/><author><name>Bichitra Mani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04287910528808991198</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-651389203414988846.post-5316598008231277798</id><published>2009-06-26T12:09:00.000-07:00</published><updated>2009-06-26T12:10:47.555-07:00</updated><title type='text'>एसपी के बहाने</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;                       मैं&lt;/span&gt; कभी एसपी सिंह से आमने-सामने नहीं मिला। लेकिन दूरदर्शन पर आजतक के 20 मिनट के बुलेटिन से काफी पहले उनके नाम और चेहरे से वाकिफ हो चुका था और बहुत हद तक उनका प्रशंसक भी। पत्रिकाओं और अखबारों में छपने वाले उनके लेखों ने बताया कि वे एक बड़े पत्रकार हैं और उनके लेखों के समाजवादी रुझान ने मुझे उनका मुरीद बनाया। जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की संस्तुतियों को लागू किया तो पूरे देश में बड़ा हाय-तौबा मचा। मंडल आयोग की उस तपिश में बरसों तक कइयों की विचारधारा और कइयों का असली चेहरा झुलसता रहा। टीवी का चलन नहीं था और अखबारों में भी ज्यादातर मंडल का विरोध ही दिखता था। कभी खुल्लमखुल्ला तो कहीं लुका-छुपा के। उन्हीं दिनों एसपी का एक करारा लेख किसी पत्रिका (शायद इंडिया टुडे) में पढ़ा। पिछड़ों को कोसने वालों पर सीधा प्रहार करते हुए एसपी सिंह ने लिखा था कि बराबरी और समता की बात करने वाले अगड़ी जाति के लोग पिछड़ों पर जातिवादी होने का ठप्पा ऐसे लगाते हैं गोया सवर्ण तो जातिवादी होते ही नहीं। बड़ी बेबाकी से बात कही गयी थी और वह दिल को छू गयी। सोचा था कभी मौका मिला तो सामाजिक न्याय और समाजवाद के सवाल पर एसपी सिंह से जरूर बात करुंगा। लेकिन इस बात का बहुत अफसोस है कि ऐसा नहीं हो सका। उनके दौर का होकर भी उनसे मिल नहीं सका।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                        लेकिन&lt;/span&gt; यह सोचकर मन को सांत्वना मिलती है कि जिन लोगों ने एसपी से पत्रकारिता सीखी, उनके साथ रहकर काम किया, उनके सहयोगी रहे या फिर शिष्य, उन्होंने ही एसपी के व्यक्तित्व से कौन सी प्रेरणा ली? कहां रहा बेलौस होकर सच को सामने रखने का माद्दा? कहां रही पत्रकारिता को बुनियादी सवालों से जोड़ने की अकुलाहट? कहां रही पत्रकारिता की बनी-बनायी लीक को छोड़कर एक नई राह अपनाने की कोशिश? ये वो सवाल हैं, जिनका जवाब ढूंढ़ने की कोशिश ही मन को ये राहत देती है कि चलो हम नही मिले तो क्या हुआ। जो मिले, उन्होंने ही क्या कर लिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/651389203414988846-5316598008231277798?l=alaaw.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://alaaw.blogspot.com/feeds/5316598008231277798/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=651389203414988846&amp;postID=5316598008231277798' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/5316598008231277798'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/5316598008231277798'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://alaaw.blogspot.com/2009/06/blog-post_26.html' title='एसपी के बहाने'/><author><name>Bichitra Mani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04287910528808991198</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-651389203414988846.post-5906560536376841322</id><published>2009-06-25T11:49:00.000-07:00</published><updated>2009-06-25T11:53:37.587-07:00</updated><title type='text'>अच्छे कल के लिए जरूरी है आपातकाल की याद</title><content type='html'>तब गुलामी थी और इंग्लैंड में विंस्टन चर्चिल जैसा अकड़ू प्रधानमंत्री था। चर्चिल ने भारतीयों की आजादी की मांग को यह कहकर नकार दिया कि अगर भारत को आजाद कर दिया गया तो भारतीय आपस में लड़कर ही मर जाएंगे। तब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े शिखर पुरुष महात्मा गांधी ने कहा कि आजाद होकर हम चाहे मरें या जीयें, बस आप हमारा पिंड छोड़ दो। गांधी को अपने देश के व्यक्तित्व और देशवासियों की मानसिकता पर पूरा भरोसा था। लेकिन तीन दशक बाद उस भरोसे की बलि चढ़ाने की कोशिश उस इंदिरा गांधी की दिमाग से निकली, जो गांधी के सबसे करीबी और राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाने वाले जवाहरलाल नेहरू की पुत्री थीं। 25-26 जून 1975 की आधी रात को जब सारा देश सो रहा था, तब लोकतंत्र को सदा के लिए सुलाने की कोशिश हुई। समाज के आखिरी आदमी के हितों को ताक पर रख दिया गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण समेत विपक्ष के सारे नेताओं ने रातों-रात खुद को जेल की चारदीवारी के भीतर पाया। जिसने भी इंदिरा गांधी की करनी से थोड़ी भी नाइत्तफाकी रखी, वो सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया। चाहे वो कभी इंदिरा गांधी के खासमखास रहे चंद्रशेखर रहे हों या फिर हिंदुस्तान के तकरीबन सवा लाख लोग। ईसा मसीह को एक बार सूली पर चढ़ाया गया था, अपने यहां लोकतंत्र तो पूरे 635 दिनों तक सूली पर लटका रहा।&lt;br /&gt;अब ये सवाल उठ सकता है कि 34 साल पुरानी लकीर पीटने का क्या मतलब है। आज देश चहुमुखी विकास का मुंह देख रहा है, जैसा कि सरकारी आंकड़े और सरकार के लोग ढिंढोरा पीटते हैं। विकास, तरक्की और चकाचौंध की इस दीवाली में आपातकाल की उदासी बहुतों को ऐसा ही लग सकता है, जैसे किसी ने उनकी खीर में नीबू निंचोड़ दिया हो। लेकिन आपातकाल की याद इस बात की तस्दीक कराने के लिए काफी है कि यह देश सत्ता के हुक्मरानों को अपने ठेंगे के नीचे रखने का माद्दा रखता है। लोकतंत्र में भले ही नव राजा-रानियों की संतानें आप पुष्पित-पल्लवित हो रही हैं लेकिन आखिरी आदमी की आवाज को नकारना आसान नहीं होगा। इसीलिए जिस दौर में सरकारें पूंजी की प्रवक्ता बनने में भी अपनी खुशकिस्मती समझ रही हैं, आपातकाल और उसके बाद इंदिरा गांधी का हश्र यह बताने के लिए काफी है कि लोकतांत्रिक मूल्यों और आखिरी आदमी की वेदना और संवेदना से खिलवाड़ मत करो। अभी तो 34 साल हुए हैं, जबकि 3400 साल बाद भी आपातकाल के खिलाफ उठी 34 साल पुरानी आवाज ऐसे ही गूंजती रहेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/651389203414988846-5906560536376841322?l=alaaw.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://alaaw.blogspot.com/feeds/5906560536376841322/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=651389203414988846&amp;postID=5906560536376841322' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/5906560536376841322'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/5906560536376841322'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://alaaw.blogspot.com/2009/06/blog-post_25.html' title='अच्छे कल के लिए जरूरी है आपातकाल की याद'/><author><name>Bichitra Mani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04287910528808991198</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-651389203414988846.post-1061618264106520546</id><published>2009-06-06T11:30:00.000-07:00</published><updated>2009-06-06T11:31:59.444-07:00</updated><title type='text'>किन महिलाओं के लिए महिला आरक्षण ?</title><content type='html'>शरद यादव का मजाक बनना था, बना। निंदा होनी थी, हुई। महिला आरक्षण पर संसद में उनकी राय ने कइयों की कनपटी के नीचे एक आग सुलगा दी। आखिर चिंगारी भी तो दमदार थी। महिला आरक्षण पर संसद में जनता दल (एकीकृत) के नेता ने कहा कि महिला आरक्षण विधेयक उन्हें मौजूदा स्वरूप में मंजूर नहीं है। उनके पास संसद में दलबल भले ना हो लेकिन जैसे-तैसे यह विधेयक पास हो गया तो वह सदन में ही जहर खाकर जान दे देंगे-सुकरात की तरह। फिर तो बवाल मचना ही था। मच गया लेकिन ठंडे दिमाग और बड़े दिल के साथ कुछ सोचने के लिए शरद यादव ने कुछ सुलगते सवाल भी छोड़ दिये हैं।&lt;br /&gt;पहला सवाल यह है कि महिलाओं को आरक्षण का मतलब क्या है? एक वाक्य में कहा जाए तो जवाब होगा- महिलाओं की बेहतरी, संसदीय लोकतंत्र में उनकी मजबूत भागीदारी और उनका सशक्तीकरण। लेकिन इस जवाब में ही एक दूसरा सवाल भी छुपा है कि किन महिलाओं का सशक्तीकरण, किनकी भागीदारी और किनकी बेहतरी? जाहिर तौर पर इस सवाल का जवाब उन महिलाओं के भीतर खोजा जाएगा, जो उपेक्षित-वंचित तबके से आती हैं। जिनकी पूरी जिंदगी पिछड़ा और नारी होने की दो पाटों के बीच पीसती रही है। जो पांच कोस जाकर पीने का पानी लेकर घर आती हैं। जिसके पास इतनी सामर्थ्य नहीं होती कि पति और बच्चों के साथ दो जून का भर पेट खाना खा सके। जो हर शाम पेट पर पुराना कपड़ा बांधकर सोने को अभिशप्त है। अब आप बताइए कि क्या महिला आरक्षण की कामधेनु उस दरवाजे पर नहीं बंधनी चाहिए, जिसे वाकई जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की दरकार है? मन का दुराग्रह निकाल कर देखा जाए तो इस सवाल पर शरद यादव आपको सौ फीसदी सही दिखेंगे। गुजराल के समय में अपनी ही सरकार और अपने ही प्रधानमंत्री से वह दो दो हाथ संसद में ही कर चुके हैं।&lt;br /&gt;अगर मौजूदा स्वरूप में ही महिला आरक्षण विधेयक पास हो गया तो भारतीय लोकतंत्र के नए राजवंशियों का ही कब्जा उन सीटों पर होगा, जो महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। जो ताकतवर राजनेता हैं, वे तो सामान्य सीटों पर चुनाव लड़ेंगे ही, आप देख लीजिएगा कि अपनी पत्नियों, बहुओं, बेटियों को वो महिला आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़वाएंगे। यानी चित भी मेरी, पट भी मेरी और अंटी मेरी जेब में।&lt;br /&gt;सत्ता की चाहत और राजनीति में खुद को बनाए रखने की अंतहीन लालसा ने शरद यादव को उस भाजपा के साथ बीते ग्यारह साल से खड़ा कर रखा है, जो महिला आरक्षण पर कांग्रेस के सुर में सुर मिलाती है। अब भाजपा के साथ आकर अपनी समाजवादी कमीज को शरद ने थोड़ी धुमिल भले कर दी है लेकिन समाजवाद का पुराना सत्व उनमें बाकी है। वही सत्व उन्हें कभी अपने प्रधानमंत्री गुजराल से भिड़ जाने की ताकत देता है तो अब मनमोहन सरकार से टकराने की। एक ईमानदार सवाल उठाकर शरद यादव ने बधाई पाने का काम किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विचित्रमणि&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/651389203414988846-1061618264106520546?l=alaaw.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://alaaw.blogspot.com/feeds/1061618264106520546/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=651389203414988846&amp;postID=1061618264106520546' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/1061618264106520546'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/1061618264106520546'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://alaaw.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='किन महिलाओं के लिए महिला आरक्षण ?'/><author><name>Bichitra Mani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04287910528808991198</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-651389203414988846.post-6529061563827689887</id><published>2008-08-29T21:07:00.000-07:00</published><updated>2008-08-29T21:09:51.933-07:00</updated><title type='text'>कोसी कितनी दोषी?</title><content type='html'>&lt;strong&gt;(बिहार में बाढ़ पर ये छोटा सा आलेख एक नवोदित लेखक विकास कुमार सिंह का है। अपनी पीड़ा, वेदना और बिहार के जरिये इंसानी लोभ को उन्होंने उकेरने की कोशिश की है।)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कोसी की गिनती अल्हड़ और खुद ही अपनी लकीर खींचने वाली नदी के रूप में होती है। कब, कहां और कैसे वो अपना रास्ता बदल दे, ये कोई नहीं जानता। शायद वह नदी ये संदेश देना चाहती है कि प्रकृति को अपना काम करने देने हो और खुद को उसके मुताबिक ही ढालकर जीना सीखो। प्रकृति का सहचर बनो, उस पर हावी होने की कोशिश मत करो। लेकिन मनुष्य का स्वभाव ही हर जगह अपनी हेठी और खुद को बड़ा साबित करने का बन चुका है। बिहार में प्रलय का दूसरा नाम बनकर जो बाढ़ आई है, उसने एक बार फिर कोसी को चर्चा का केंद्र बिंदु भी बना दिया है। कोसी ने पूरी तरह अपनी राह बदल ली। इससे बाढ़ और प्रलयंकारी हो गयी। उसकी छवि एक बेहद आवारा नदी की बन गयी और उसके पाश में बिहार के कमोबेश दस जिले जिंदगी की पनाह मांग रहे हैं।&lt;br /&gt;कोसी पर बना भीमनगर का बांध अतिरिक्त जल का दबाव नहीं सह पाया और वह टूट गया। ऐसा बार बार कहा गया लेकिन क्या सच्चाई सिर्फ इतनी ही है। उस तटबंध में दरार और थोडा बहुत पानी रिसना तो अगस्त के बिल्कुल शुरु में ही शुरू हो गया था। लेकिन तब तक उस पर ध्यान नहीं दिया गया, जब तक हालात हाथ से निकल नहीं गया। १५ अगस्त को जब पूरा देश आजादी की सालगिरह मना रहा था, तब उत्तर बिहार के बाढ़ प्रभावित लोगों को साफ दिखने लगा था कि मौत उन्हें गुलाम बनाने आ रही है। लेकिन वो स्थिति नहीं बनती, अगर तटबंध पर पहले ही ध्यान दिया गया होता।&lt;br /&gt;अब सवाल है कि आगे क्या होगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया, लाखों टन अनाज पहुंच गये और सेंटर से एक हजार करोड रूपये भी। इतने रूपये देखकर अनायास वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ की किताब एवरीबडी लव ए गुड ड्राउट की याद आती है, जिसमें बताया गया है कि कैसे नेता और अफसर बाढ़ और सूखे का इंतजार करते हैं ताकि राहत के नाम पर मिला पैसा उनकी अंटी में चला जाए। क्या बिहार के मामले में भी यही नहीं होगा? महीने दो महीने में लोग भूल जाएंगे कि कुछ समय पहले ही बिहार विनाश के कगार पर बैठा था।&lt;br /&gt;आज जो अधिकारी कोसी को दोषी ठहरा रहे हैं, सच पूछिये तो मन ही मन वो अतिशय प्रसन्न होंगे क्योंकि राहत फंड से उनकी तमाम चाहत पूरी होगी। आखिर इस देश को किसी नदी की बनती बिगड़ी धारा नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की आवारा रफ्तार ही बर्बाद कर रही है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/651389203414988846-6529061563827689887?l=alaaw.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://alaaw.blogspot.com/feeds/6529061563827689887/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=651389203414988846&amp;postID=6529061563827689887' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/6529061563827689887'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/6529061563827689887'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://alaaw.blogspot.com/2008/08/blog-post_29.html' title='कोसी कितनी दोषी?'/><author><name>Bichitra Mani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04287910528808991198</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-651389203414988846.post-9070082063714213771</id><published>2008-08-25T08:08:00.000-07:00</published><updated>2008-08-25T08:11:36.288-07:00</updated><title type='text'>कॉर्पोरेट नागरिकता जिंदाबाद!</title><content type='html'>विलासराव देशमुख हमेशा मुस्कुराते रहते हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है बल्कि अच्छा है कि सेहत दुरुस्त रहे। क्या पता, ६३ साल की उम्र में भी नौजवानों की तरह चमकते दमकते रहने के पीछे एक बड़ा कारण ये भी हो। उनकी मुस्कुराहट कुछ इंच और बढ़ गयी है, जबसे सुना है कि रतन टाटा सिंगूर से अपनी नैनो प्रोजेक्ट को हटाने की चेतावनी दे चुके हैं। लगे हाथ महाराष्ट्र के महापराक्रमी मुख्यमंत्री ने कह दिया कि आइए टाटा, हम करते हैं आपका स्वागत। हम आपको देंगे जमीन। जरूर दीजिए जमीन लेकिन कीमत क्या होगी? करोड़ों का वारा न्यारा या फिर किसानों की मुसीबत? क्या ऐसा नहीं होगा कि सिंगूर के किसानों का दर्द अब विदर्भ के किसानों में गुणात्मक बढोत्तरी के साथ उभकर सामने आएगा?&lt;br /&gt;आखिर महाराष्ट्र के विदर्भ में जमीन बिक रही है। किसानों की हालत खराब है और चिदंबरम साहब का ६० हजार करोड़ का महादान भी उनकी गाड़ी को पटरी पर ला नहीं पा रहा है। ऐसी खबर बार बार आती है कि नागपुर से अकोला के बीच कर्ज के मारे किसाने अपनी जमीन औने पौने दामों पर बेचने को तैयार हैं। वहां आलम ये है कि दस फीसदी लोग भी ऐसे नहीं हैं, जिन्हें भर पेट पौष्टिक भोजन मिलता हो। कमोबेश सभी परिवार कर्ज से दबे हैं और इसे सिर्फ कहावत मत समझिएगा बल्कि कड़वी सच्चाई है कि नमक रोटी पर उनका गुजारा चलता है और वो भी भर पेट नहीं मिलता। रोजगार गारंटी योजना को लेकर कांग्रेसी चारणवृंद जब तब राहुल गांधी की जयजयकार करते हैं और खुद कांग्रेस के युगपुरुष राहुल जी महाराज संसद में शशिकला और कलावती के बहाने विदर्भ और किसानों पर घड़ियाली आंसू बहा चुके हैं। बावजुद इसके विदर्भ के ज्यादातर इलाकों में रोजगार गांरटी योजना शुरु नहीं हो पायी है। अब ऐसे में जमीन बेचकर किसान से खेतिहर मजदूर और फिर मजदूर होते हुए भिखारी बनने या फिर खुदकुशी करने के अलावा उन किसानों की नियति में और क्या हो सकता है। लेकिन उन किसानों की वेदना से खुद को जोड़ने की सच्चे मन से किसी राजनेता ने क्या कोशिश की? करीब चार साल से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान देशमुख ने ही कहां कुछ सोचा। टाटा के लिए जाजम की तरह बिछने को बेताब मुख्यमंत्री बखूबी जानते हैं कि पैसा तो धनपशुओं से मिलेगा और आज राजनीति की सार्वभौमिक सच्चाई बन गया है अनाप शनाप पैसा।&lt;br /&gt;हालांकि बुद्धदेव भट्टाचार्य जिस तरह टाटा को मनाने में लगे हैं, उससे लगता नहीं कि सिंगूर की नैनो महाराष्ट्र में सजने संवरने जा पाएगी। लेकिन देशमुख जी, घबराने की बात नहीं है। कोई दूसरा टाटा किसानों की जमीन खरीदने आ जाएगा और आप की सरकार करेगी बिचौलिये का काम। किसान गए भाड़ में,  कॉर्पोरेट नागरिकता जिंदाबाद!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/651389203414988846-9070082063714213771?l=alaaw.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://alaaw.blogspot.com/feeds/9070082063714213771/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=651389203414988846&amp;postID=9070082063714213771' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/9070082063714213771'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/9070082063714213771'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://alaaw.blogspot.com/2008/08/blog-post_25.html' title='कॉर्पोरेट नागरिकता जिंदाबाद!'/><author><name>Bichitra Mani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04287910528808991198</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-651389203414988846.post-3952673481304736098</id><published>2008-08-24T08:49:00.000-07:00</published><updated>2008-08-24T08:51:20.342-07:00</updated><title type='text'>कॉर्पोरेट नागरिक बनोगे!</title><content type='html'>तो सुना आपने, महान देशभक्त रतन टाटा क्या कह रहे हैं? हर अखबार का पहला पन्ना और उसकी कमोबेश पहली खबर उनकी इस धमकी से बनी थी कि बहुत हुआ, अब बर्दाश्त नहीं करेंगे और किसान नहीं माने तो वो सिंगूर को टा टा बोल देंगे। अब देश की नइय्या पार लगाने वाले रतन टाटा जी महाराज ने धमकाया या चेतावनी दी तो खुद को सर्वहारा का प्रतिनिधि बताने वाली पश्चिम बंगाल की सरकार सीधे शीर्षासन पर उतर आयी। दूसरी तरफ महाराष्ट्र से लेकर उत्तराखंड तक के मुख्यमंत्रियों ने टाटा को नयनों में बसा लिया और उनकी सिंगूर वाले प्रोजेक्ट को अपने सूबे में लगाने का न्यौता दे दिया। यानी लाल सलाम से लेकर दलाल सलाम के जरिये सरकार बचाने वाली कांग्रेस और पार्टी जरा हटके भाजपा तक टाटा के स्वागत में जाजम की तरह बिछ गये। आखिर कहीं तो सियासतदानों ने एकजूटता दिखाई। धन्य हैं।&lt;br /&gt;होगी नेताओं के लिए ये चिंता की बात कि सिंगूर में किसानों के विरोध से टाटा दुखी हो गये और सि्गूर छोड़ने की उन्होंने धमकी दे दी। लेकिन असल चिंता कुछ और भी है। २१ अगस्त को कोलकाता में रटन टाटा ने कहा कि ये कोलकाता को तय करना है कि उसे अवांछित नागरिक चाहिए या अच्छा कॉर्पोरेट नागरिक। इशारों में रटन टाटा ने वामपंथियों को भी धमका दिया कि अगर लाल सरकार की पुलिस के होते हुए भी सिंगूर का उनका किला महफूज नहीं रहता तो फिर वो सरकार निकम्मी है। टाटा चाहें तो बुद्धदेव भट्टाचार्य को गरिया सकते हैं, हमको आपको दिखाने के लिए भी। लोगों के सामने तो मजनूं को लैला बुरा बोल ही देती है। लेकिन हम जिस समाज में जीते हैं, उसका मानस कौन तय करेगा? हमें कैसा नागरिक बनना है, वो कौन बताएगा? हम कैसा समाज हैं, इसका सर्टिफिकेट कौन देगा? हमें भारतीय नागरिक बनना है या टाटा जी का कॉर्पोरेट नागरिक, ये कौन तय करेगा? आखिर हम अपना नफा नुकसान देखने वाले एक बनिये के बताए रास्ते पर चलेंगे या फिर उस रास्ते पर दो डेग भरने की जहमत उठाएंगे, जिसे हमारे महान राष्ट्रपिता ने बनाया है?&lt;br /&gt;किसानों की पीड़ा है कि कोलकाता से महज ४० किलोमीटर दूर सिंगूर में उनकी जमीन टाटा के लिए सरकार ने जबरन हथियाई। उनका ये भी कहना है कि वो जमीन उपजाऊ है और उस पर बाप दादा के जमाने से वो खेती करते आ रहे हैं। जमीन के मुआवजे से पांच लाख रुपये मिल ही गये तो उससे उनका क्या होगा। आखिर अपनी जड़ और जमीन से उखड़कर वो क्या करेंगे। यकीकन पहले वो किसान थे, फिर खेतिहर मजदूर बनेंगे और उसके बाद ठेठ मजदूर, जिनकी ना तो कोई जमीन होगी, ना सपनों का आसमान होगा। क्या टाटा के पांच लाख रुपल्ली से उनकी जिंदगी चल जाएगी? दूसरी बात ये है कि कॉर्पोरेट कल्चर के बाद कॉर्पोरेट नागरिक बनाने चले रतन टाटा ने जिन किसानों की जमीन ली, क्यों नहीं उन्हें अपनी कंपनी का शेयरधारक बना दिया। तब समझ में आता कि लेवल पर कॉर्पोरेट कल्चर बह रहा है और देश भी देखता कि उद्धारक का लिबास ओढ़े एक उद्योगपति मानवीय संवेदना से भी भरा है। आखिर गांधी ने ट्रस्टीशीप के सिद्धांत में इसी बात पर ही तो बल दिया था। क्यों नहीं सरकारें गांधी की बात को कबूल कर लेती हैं? आखिर ये देश गांधी के सपनों और संघर्षों से निकला है, टाटा और उनके इशारों पर ता ता थैया करने वाली सरकारों के कमाऊ खाऊ और खून पीऊ नीतियों से नहीं।&lt;br /&gt;लिहाजा किसानों को कॉर्पोरेट नागरिक बनवाने निकले रतन टाटा को चाहिए कि पहले खुद एक साफ सुथरा नागरिक बनें। वो नागरिक, जिसकी आत्मा इस देश की रीढ़ माने जाने वाले किसानों का खून निचोड़कर खुश ना होती हो। तब वो अपना कॉर्पोरेट चलाएं। होंगे रतन टाटा बहुत बड़े देशभक्त लेकिन मैं ये मानने को तैयार नहीं कि किसानों से ज्यादा वो देश की बेहतरी कर सकते हैं या उसके बारे में सोच सकते हैं। इसीलिए सरकारों के लिए भी टाटा के बहाने ये एक चेतावनी ही है कि खेतिहर समाज के धीरज का वे ज्यादा इम्तिहान ना लें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/651389203414988846-3952673481304736098?l=alaaw.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://alaaw.blogspot.com/feeds/3952673481304736098/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=651389203414988846&amp;postID=3952673481304736098' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/3952673481304736098'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/3952673481304736098'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://alaaw.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='कॉर्पोरेट नागरिक बनोगे!'/><author><name>Bichitra Mani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04287910528808991198</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-651389203414988846.post-3140411291294116153</id><published>2008-07-28T11:29:00.000-07:00</published><updated>2008-07-28T11:32:09.363-07:00</updated><title type='text'>कुछ कहते हुए भी मौन प्रार्थना</title><content type='html'>धमाके हमारी नियति बनते जा रहे हैं। जिस तरह भ्रष्टाचार को हमने अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया है, उसी तरह बम धमाके भी धीरे धीरे हमारे मानस में छठे छमाहे होने वाले हादसे की तरह पैठ बनाते जा रहे हैं। कभी बनारस में हुआ, कभी मुंबई में तो कभी दिल्ली तो कभी हैदराबाद, मालेगांव, जयपुर, बैंगलोर, अहमदाबाद...बम धमाकों और मासूमों की लाश और बेबसी गिनते अनंत सवाल। पहले डर लगता था, अब वो डर एक ऐसी पीड़ा की शक्ल ले चुका है, जिसमें पोर दर पोर टूटना ही लिखा है। जैसे छोटे से घाव के रिसने पर कराहने वाला आदमी कैंसर का असह्य कष्ट झेलने लगता है। अहमदाबाद और बैंगलोर की वो पीड़ा हमारे समाज के उसी कैंसर से निकला है, जिसका इलाज करने की हमने जहमत ही नहीं उठायी। दुर्भाग्य ये है कि अभी भी खांसी जुकाम की दवा से उस मरीज को जिलाने की हसरत पाले हुए हैं। क्या ये सच नहीं है कि जैसे मुंबई, बनारस, दिल्ली और दूसरे बम धमाकों और उसमें खोयी जिंदगियों का गम अब हमारे जेहन में नहीं है, वैसे ही कल हम बैंगलोर और अहमदाबाद को भी भुला देंगे? वेदना की इस घड़ी में ये कहना मर्म पर चोट पहुंचाने वाला जरूर लग सकता है, लेकिन हम सब दो तीन दिन में अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेंगे। अहमदाबाद में सोनिया गांधी पहुंची, मनमोहन सिंह पहुंचे, नरेंद्र मोदी पहुंचे। दो चार दिन तक जाने-अनजाने नायकों का वहां जाना लगा हुआ है। सब रटी रटायी बात कर रहे हैं। भाजपा कांग्रेस को कोस रही है, कांग्रेस भाजपा को।&lt;br /&gt;लेकिन हमारे समाज का मानस क्या सोचता है? मेरे एक मित्र, जिनकी रा और आईबी में काफी पैठ है, एक बार बता रहे थे कि मुंबई और दूसरी जगहों पर बम धमाके करने वाले कुछ आतंकवादियों से पूछा गया कि वो ऐसा क्यों करते हैं। तो जवाब आया कि २००२ के गुजरात दंगों का बदला लेने के लिए। लेकिन २००२ के दंगे तो नरेंद्र मोदी के राज में हुआ था, लिहाजा बदला तो गुजरात में लिया जाना चाहिए। लेकिन वहां तो धमाका होता नहीं। पकड़े गये एक आतंकवादी का कहना था कि अगर हमने गुजरात में कुछ किया तो मोदी एक एक कर मुसलमानों को मरवाना शुरु कर देंगे, जैसा कि छह साल पहले हुआ था। पूछने वाले अधिकारी का निष्कर्ष था कि मोदी का डर गुजरात को आतंक की आग से बचाए रखेगा। लेकिन अहमदाबाद में बहे खूनों ने उस निष्कर्ष को लहूलुहान कर दिया है। क्या इससे एक धुंधली तस्वीर ये नहीं बनती कि सिर्फ कड़ाई या चतुराई दिखाने से आतंकवाद दूर नहीं हो सकता। मोदी गुजरात के एक बड़े हिस्से को ये एहसास तो दिला सकते हैं कि उनके राज में कुछ नहीं होगा लेकिन अंदर से उनका साहस और खुफिया तंत्र भी सड़ा हुआ है।&lt;br /&gt;हर धमाके के बाद एक सवाल ये भी उठता है कि आतंकवादियों को स्थानीय लोगों का प्रश्रय मिला था। बात सही है और जब ये सवाल उठता है तो उंगली स्थानीय मुसलमानों की तरफ ही उठती है। दंगों में वो भी बहुत कुछ गंवाते हैं लेकिन उनकी पीड़ा इस मामले में थोड़ी अलग होती है कि वो ना सिर्फ अपनों का जनाजा उठाते हैं, बल्कि सशंकित नजरों से देखे जाने का असहनीय बोझ भी वो उठाते हैं। बीस साल पहले भारत में जम्मू-कश्मीर को छोड़कर कोई भी इलाका आतंकवाद की वैसी चपेट में नहीं रहा, जैसा कि अब है। पंजाब, असम और उत्तर पूर्व की कुछ आतंकवादी गतिविधियां उन धमाकों से जुदा हैं, जो हर कुछ महीनों पर हमें भोगना पड़ता है। अगर ये मान भी लिया जाए कि आतंकवादी स्थानीय मुसलमानों को मजहब के नाम पर बरगलाते हैं तो भी वैसे माहौल के लिए क्या देश के कुछ स्वनाम धन्य बड़े नेता दोषी नहीं हैं? हिंदुस्तान में हिंदू-मुसलमान की लड़ाई काफी पुरानी है। अब धमाके होते हैं, पहले दंगे होते थे। जो रिकॉर्ड है, उसके मुताबिक पहला दंगा १७९२ या ९३ में होली के समय हुआ था और वो भी गुजरात के तटीय इलाके में। उसके बाद भी दंगे फसाद होते रहे, हिंदुओं और मुसलमानों में जब तब ठनती रही लेकिन उनकी ये लड़ाई कुछ वैसी ही थी, जैसे दो चचाजात भाइयों में होती है। जमीन जायदाद के मसले पर होने वाली छोटी मोटी लड़ाई, जो धीरे धीरे फिर से प्यार और मनुहार में बदल जाती है। लेकिन ६ दिसंबर १९९२ को अयोध्या में जो कुछ हुआ और मर्यादा के पुरुषोत्तम भगवान राम के नाम पर हुआ, उसने दिलों में दरार पैदा कर दिया। मंदिर और मस्जिद टूटे तो वो जुड सकते हैं लेकिन भरोसे वाला दिल दरक जाए तो फिर उसका जुड़ना मुश्किल हो जाता है। उस घटना के बाद से ही हिंदू मुसलमानों में एक तीक्ष्ण विभेदक दूरी बन गयी या बना दी गयी।&lt;br /&gt;अब उसके लिए दोषी कौन है? बगैर किसी लाग लपेट के कहा जाए तो कांग्रेस और भाजपा। इन दोनो पार्टियों में भेद करना उतना ही मुश्किल है, जितना मुश्किल खुद भगवान राम के लिए बालि और सुग्रीव में भेद करना था। जिस तरह दोनो की शक्ल हू ब हू मिलती थी, वैसे ही कांग्रेस और बीजेपी भी हु ब हू मिलते हैं। नई सोच वाले नई उम्र के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अयोध्या में अनायास और नाहक राम जन्मभूमि का ताला खुलवा दिया और लाल कृष्ण आडवाणी की अगुवाई में बीजेपी के कारसेवकों (या संहारसेवकों) ने राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद का ढांचा गिरा दिया। मौनी बाबा बने रहने वाले कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव ने गुप चुप तरीके से भाजपा का साथ दिया। राव के बारे में यूं ही नहीं कहा जाता था कि धोती के नीचे वो आरएसएस का हाफ पैंट पहनते थे।&lt;br /&gt;आपको लग रहा हो कि विषयांतर हो रहा है। कहां तो हम धमाके की बात कर रहे थे और कहां उस धमाके को भाजपा और कांग्रेस पर पटक रहे हैं। लेकिन ये बात हम इसलिए कर रहे हैं कि देश की दोनो मुख्य पार्टियों ने कभी जनमत को साफ सुथरा बनाने की कोशिश नहीं की। अगर धर्म के नाम पर विभाजन और वोट के लिए बांग्लादेश से घुसपैठ पर इन्होंने सुदृढ़ इच्छा शक्ति के साथ काम किया होता तो हर आए दिन आतंक की आग में झुलसने के लिए ये देश अभिशप्त नहीं होता। आखिर जब तक हमारे मन का आतंकवाद नहीं मरेगा, पोटा या सोंटा या गोली बारूद से आतंकवाद का खात्मा नहीं हो सकता। क्या हम इसके लिए तैयार हैं? अभी तो कुछ कहते हुए भी मौन प्रार्थना ही की जा सकती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/651389203414988846-3140411291294116153?l=alaaw.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://alaaw.blogspot.com/feeds/3140411291294116153/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=651389203414988846&amp;postID=3140411291294116153' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/3140411291294116153'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/3140411291294116153'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://alaaw.blogspot.com/2008/07/blog-post_102.html' title='कुछ कहते हुए भी मौन प्रार्थना'/><author><name>Bichitra Mani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04287910528808991198</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-651389203414988846.post-5434692580321023288</id><published>2008-07-28T06:43:00.000-07:00</published><updated>2008-07-28T06:52:45.647-07:00</updated><title type='text'>कलावती के बहाने देखो स्वार्थ साधने की कला</title><content type='html'>कांग्रेस महासचिव और सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी के लोकसभा में दिये भाषण की इतनी चर्चा और प्रशंसा हो रही है कि कहिए मत। जिसे देखिए वही ३८ साल के इस कांग्रेस सांसद के भाषण की संजीदगी पर कुर्बान हुए जा रहा है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। वह देश के सबसे मजबूत राजनीतिक परिवार के वारिस हैं और कल की कांग्रेस की आशा और अरमान के इकलौते केंद्र बिंदु। वैसे भी जिस तरह संसद में बहस का स्तर गिरता जा रहा है और लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत असभ्यता का अखाड़ा बन गयी है,  उसमें राहुल गांधी की शालीनता कुछ को लुभाएगी ही। जिन्हें लुभाया, वो शान बघारेंगे ही।&lt;br /&gt;राहुल ने कलावती की चर्चा संसद में छेड़ी। राहुल उस गरीब विधवा का नाम नहीं लेते तो कलावती को कोई जानता भी नहीं। लेकिन उसका नाम लेकर राहुल ने उन्हें लाइमलाइट में ला दिया। विदर्भ की रहने वाली कलावती देश के करोड़ो अभागे किसानों में से एक है और उसकी जिंदगी की कुल जमा पूंजी और उपलब्धि बस इतनी है कि राहुल गांधी उसके दर पर पहुंच गये। राहुल ने कलावती का हाल चाल पूछा। उन्हें पता चला कि कलावती के पति ने पचास हजार रुपये कर्ज लिये थे और उसे चुकाने में अक्षमता की वजह से उसने खुदकुशी कर ली थी। कलावती का पति तो दुनिया छोड़ गया लेकिन कर्ज सूद समेत अब ८५ हजार रुपये तक पहुंच गया है। कलावती किसान से खेतिहर मजदूर बन गयी है और कल उसके चार बच्चों का क्या होगा, वो नहीं जानती। हारे को हरिनाम जैसी कहावत कलावतियों के लिए ही होती है।&lt;br /&gt;अब राहुल गांधी ने कलावती के लिए क्या किया? एक अखबार ने संसद में राहुल के भाषण के दूसरे दिन छापा कि राहुल कलावती के घर गये, उसे देखा और कुछ नहीं किया। आखिर पूरे देश की चिंता में गलने वाले कांग्रेस के युवराज अब एक महिला के लिए क्या करें। लेकिन तमाम कलावतियों की दुर्दशा दूर करने का रास्ता उन्हें जरूर मिल गया। धन्य हैं वामपंथी जो उन्होंने मनमोहन सरकार से समर्थन वापस ले लिया और सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर संसद में चर्चा हुई और राहुल गांधी को बोलने का मौका मिला और पूरे देश ने उन्हें सुना। राहुल ने कांग्रेसी सांसद नहीं बल्कि एक भारतीय (क्या दूसरे सांसद भारतीय नहीं हैं?) बनकर बताया कि अमेरिका से परमाणु संधि होगी तो देश में बिजली का नया करंट दौड़ेगा और वहीं करंट गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी का  रामवाण इलाज होगा। इसके लिए उन्होंने अपने सज्जन और ईमानदार प्रधानमंत्री का धन्यवाद ज्ञापन भी किया।&lt;br /&gt;लेकिन सवाल है कि क्या अमेरिका से परमाणु संधि में कोई दैवीय शक्ति है कि वो गरीबी को छू मंतर कर देगा। अगर परमाणु बिजली इतना महत्वपूर्ण है तो अमेरिका ने १९७८ के बाद अपने यहां एक भी परमाणु बिजली घर क्यों नहीं स्थापित किया? फिर अमेरिका में ही कितना परमाणु बिजली का इस्तेमाल होता है, इसको लेकर थोड़ा बहुत मतभेद हो सकता है लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक वहां भी परमाणु उर्जा से तीन से चार फीसदी ही बिजली उत्पन्न होती है। दरअसल परमाणु बिजली के लिए यूरेनियम चाहिए और युरेनियम का भाव इन दिनों ३०० डॉलर प्रति किलोग्राम है। इस हिसाब से देखिए तो परमाणु बिजली कितनी महंगी पड़ेगी और कितने लोगों के घरों में उजाला करेगी। उस पर से पर्यावरण का जो हाल होगा, वो रोना तो अलग से रोया जाएगा। अगर ऐसा नहीं होता तो अमेरिका के अलावा ब्रिटेन और दूसरे यूरोपीय देश अपने यहां परमाणु बिजली के नए केंद्र लगाना क्यों बंद करते?&lt;br /&gt;लेकिन परमाणु संधि पर फिर भी ईमानदारी का पुतला बने मनमोहन सिंह उतारु हैं और राहुल गांधी उसे गरीबी निवारण का एक मात्र उपाय मानते हैं। इसके कारण की तरफ वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने सही इशारा किया है। प्रभाष जी ने लिखा है कि अमेरिका के साथ कमीशनखोरी का मामला दस से बीस फीसदी तक जाता है। ऐसे में अगर परमाणु उर्जा संधि के क्षेत्र में सत्रह लाख करोड़ रुपये का निवेश होता है तो दस फीसदी के लिहाज से भी एक लाख सत्तर हजार करोड़ रुपये का कमीशन मिल जाएगा। ये कमीशन भारत में किसे मिलेगा, नहीं मालूम। लेकिन सोचिए, अगर एबी बर्धन के आरोपों को ही सही मानकर चलें तो एक सांसद को खरीदने में पचीस करोड़ के लिहाज से बीस सांसदों को मैनेज करने में कुल पांच सौ करोड़ रुपये हुए। अब एक लाख सत्तर हजार करोड़ रुपये में से हजार पांच सौ करोड़ चला ही जाए तो क्या फर्क पड़ता है। ईमानदार मनमोहन सिंह, त्याग की देवी सोनिया गांधी और समाजवाद का नाम रोशन कर रहे मुलायम सिंह और अमर सिंह तो धन्य हो ही जाएंगे। किसकी किस्मत में क्या बदा है, ये तो वही जाने।&lt;br /&gt;बात फिर राहुल गांधी पर आती है। जिस विदर्भ में कलावती की पीड़ा का विधवा प्रलाप वो संसद में कर रहे थे, उसी विदर्भ में सबसे बडे साहुकारों में गिनती होती है एक कांग्रेसी विधायक दिलीप सानंदा की। कहते हैं कि सानंदा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के नाक के बाल हैं और कर्ज वसूली के नाम पर मृत किसानों का खून पीकर सानंद जी रहे हैं। ये बात विदर्भ का बच्चा बच्चा जानता है लेकिन दुर्भाग्य है कि कांग्रेस का लाडला बच्चा ही नहीं जानता। जाहिर है कि राहुल गांधी को पूरी बात की जानकारी नहीं है या फिर एक घाघ नेता की तरह वो भी अपने खुंखार विधायक और किसानों की मौत के सौदागर नेताओं को बचाना चाहते हैं। दोनो में बात चाहे जो सच हो, वो निर्मम घात करने वाली है। अब कलावती जिए या मरे, संसद में उसके नाम का मंत्रोच्चार करके राहुल बाबा ने तो अपना सद्धर्म निभा दिया। कांग्रेस गदगद हुई, सोनिया मुदित हुईं, पढ़े लिखे बुद्धिजीवी कहे जाने वालों ने जयजयकार किया, लेकिन जिस कलावती का नाम बेचा गया, वो बेचारी चालीस रुपये की मजूरी के लिए दर दर भटक रही होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/651389203414988846-5434692580321023288?l=alaaw.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://alaaw.blogspot.com/feeds/5434692580321023288/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=651389203414988846&amp;postID=5434692580321023288' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/5434692580321023288'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/5434692580321023288'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://alaaw.blogspot.com/2008/07/blog-post_28.html' title='कलावती के बहाने देखो स्वार्थ साधने की कला'/><author><name>Bichitra Mani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04287910528808991198</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-651389203414988846.post-7488290398901937637</id><published>2008-07-22T12:08:00.000-07:00</published><updated>2008-07-22T12:14:01.571-07:00</updated><title type='text'>सब गंवाकर बहुमत पाये</title><content type='html'>करार पर सरकार आफत में फंस गयी थी लेकिन अमर सिंह जैसे स्वनामधन्य नेता की मेहरबानी और मदद से मनमोहन सिंह की नैय्या पार लग गयी। कहां तो मीडिया के जानकार और पंडिता दम साधकर २७० के आंकड़े तक सरकार को पहुंचा रहे थे और कहां मनमोहन ने ऐसी हनुमान कूद लगाई कि सीधे २७५ तक पहुंच गये। अर्थात सरकार को मिला पूर्ण बहुमत। मनमोहन मुग्ध हुए, सोनिया प्रसन्न हुईं और अमर सिंह की अमर साधना पूर्ण हुई। अब सरकार आराम से परमाणु करार कर लेगी।&lt;br /&gt;लेकिन सवाल है कि जिन माननीय सांसदों के आचार व्यवहार को लेकर खुद सरकार तक को भरोसा नहीं था कि वो क्या करेंगे, उनको लेकर बाजार कैसे भांप गया था कि सरकार नहीं जा रही है। आडवाणी के शब्दों में जिस समय सरकार आईसीयू में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी, उस वक्त बाजार कुंलाचे मार रहा था और दोनो दिन ही शेयर सूचकांक में इजाफा हुआ। तो क्या ये ना माना जाए कि सरकार को चुनने वाली जनता भले गफलत में रही हो, उसे भले ही सरकार के वजूद को लेकर शक सुबहा रहा हो, लेकिन बाजार किसी असमंजस में नहीं था। ये अकारण नहीं है कि अनिल अंबानी के दोस्त अमर सिंह सरकार बचाने के लिए सांसदों के जोड़ तोड़ में जुटे थे तो दूसरी तरफ अनिल के बड़े भाई और व्यावसायिक प्रतिद्वन्द्वी मुकेश अंबानी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से एकांत में मुलाकात किया। फिर वो मुलाकात त्याग की देवी सोनिया गांधी से भी हुई। उसके बाद बड़े उद्योगपति राहुल बजाज ने जो बयान दिया, उससे भी साफ हो गया कि सरकार पर संकट नहीं है। लेकिन अपने बयान में राहुल बजाज ने ये भी जो़ड दिया कि बगैर वामपंथियों के सरकार चले तो ये ज्यादा बेहतर है।&lt;br /&gt;मैं वामपंथी नहीं हूं लेकिन चार साल से सरकार को सहारा देने वाले वामपंथियों की मौजूदगी तमाम बजाजों को क्यों अखर जाती है। इसकी तरफ तो माकपा के सांसद मोहम्मद सलीम ने अपने भाषम में साफ इशारा कर दिया था। सलीम ने दो टूक कहा कि उन्होंने तो मनमोहन सिंह को लीडर समझा था लेकिन वो तो डीलर निकले। रही बात नफा नुकसान की नजरों से ही पूरे कायनात को देखने वाले उद्योगपतियों की, तो उन्हें लीडर नहीं, डीलर चाहिए। इसीलिए बजाजों, अंबानियों, टाटाओं, बिड़लाओं, हिंदुजाओं, मित्तलों को अमर सिंह चाहिए, जिसकी कोई जमीनी हैसियत ना हो। ये हमारे समाजवादी आंदोलन का दुर्भाग्य है कि मुलायम सिंह यादव जैसा धरतीपुत्र अमर सिंह के हाथों की कठपुतली बन गया।&lt;br /&gt;विषयांतर ना हो, लिहाजा मूल विषय पर लौटते हैं। याद कीजिए कि झारखंड मुक्ति मोर्चा के चार सांसदों के १९९३ में तत्कालीन पीवी नरसिम्हाराव सरकार ने खरीदा था। मामला खुला तो नरसिम्हाराव की कैसी भद्द पिटी। पिछले पंद्रह साल में तमाम प्रदूषण और कचड़े के बावजूद यमुना में काफी पानी बह चुका है। तब चार सांसदों पर हाय तौबा मची थी लेकिन आज ना जाने कितने सांसदों की बोली लगी, कितने सांसदों को कागज के चंद मोटे टुकडों पर खरीदा बेचा गया लेकिन सरकार बचाने वाले मनमोहन सिंह अब भी ईमानदारी के पुतले बने हुए हैं। सरकारें आती हैं, जाती हैं लेकिन सरकार का इकबाल एक बार चला जाए तो वो दोबारा नहीं लौटता। लेकिन हमारा खाया पीया अघाया समृद्ध तबका मनमोहन और सोनिया के भ्रष्टाचार और गंदगी में आपादमस्तक डूबकर सरकार बचाने की अमर्यादित करनी को नहीं देखता।&lt;br /&gt;समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि जिंदा कौम पांच साल तक इंतजार नहीं करती। लिहाजा इस सड़ी गली सरकार का चला जाना बहुत जरूरी था। लेकिन दुर्भाग्य इस बात की है कि उस लोहियावादी राजनीति की उपज और खुद को समाजवादी कहने वाले मुलायम, लालू, रामविलास इस सरकार के जयकारे में जुटे हैं, जिसकी अगुवाई वर्ल्ड बैंक का एक भूतपूर्व नौकर कर रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/651389203414988846-7488290398901937637?l=alaaw.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://alaaw.blogspot.com/feeds/7488290398901937637/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=651389203414988846&amp;postID=7488290398901937637' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/7488290398901937637'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/7488290398901937637'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://alaaw.blogspot.com/2008/07/blog-post_22.html' title='सब गंवाकर बहुमत पाये'/><author><name>Bichitra Mani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04287910528808991198</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-651389203414988846.post-4061542632400815906</id><published>2008-07-19T01:28:00.000-07:00</published><updated>2008-07-19T01:40:35.143-07:00</updated><title type='text'>ये आपके इमानदार प्रधानमंत्री हैं !</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_ApQTeWPA9wc/SIGniJAah0I/AAAAAAAAAAc/ntyTUtfCno0/s1600-h/manmohan.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5224641247701534530" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_ApQTeWPA9wc/SIGniJAah0I/AAAAAAAAAAc/ntyTUtfCno0/s320/manmohan.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;जब बहुत से लोगों को, खासकर पढ़े लिखे और बुद्धिजीवी किस्म के लोगों को, ये कहते-सुनते-लिखते देखता हूं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बड़े ईमानदार और मानवीय सरोकारों से परिपूर्ण व्यक्तित्व हैं, तो मेरी भी इच्छा होती है कि अपने प्रधानमंत्री जी की तारीफ का भागीदार बनूं। एक दो रोज पहले ही कहीं पढ़ा कि कैसे मनमोहन सिंह के घर के लोग करीब तीन साल पहले एक क्रिकेट मैच के लिए कतार में खड़े होकर टिकट खरीदने गये थे। इस घटना को प्रधानमंत्री की असंदिग्ध ईमानदारी से जोड़कर देखा गया। वैसे ही कुछ समय पहले मेरे एक मित्र ने प्रधानमंत्री का बायोडाटा मुझे मेल किया था। उसमें उनकी विद्वता का बखान करते हुए आखिर में एक नोट लिखा गया था कि क्या ऐसा विद्वान प्रधानमंत्री किसी और देश को नसीब है।&lt;br /&gt;वाकई प्रधानमंत्री की इस तारीफ पर बलैया लेना चाहिए लेकिन क्या किया जाए। चलताऊ और व्यक्तिगत खूबियों के बूते किसी राष्ट्र का नक्शा नहीं बदलता, वैसे ही मनमोहन सिंह के घर वालों के कतार में खड़े होने और उनके महान बायोडाटा से भारत का बायोडाटा चमकीला नहीं हो जाता।&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री में आखिर क्या गुण होने चाहिए। बहुत पहले तुलसी दास ने लिखा था- मुखिया मुख सो चाहिए खान-पान को एक। पाले पोसे अंग सकल, तुलसी सहित विवेक। अर्थात मुखिया को मुख की तरह ही शरीर के हर अंग का बराबर खयाल रखना चाहिए। बस इसी कसौटी पर प्रधानमंत्री को कसा जाए तो क्या वो देश का मुखिया बने रहने के हकदार हैं। एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक ही इस समय देश के ८४ करोड़ से ज्यादा लोग हर रोज बीस रुपये से भी कम कमाते हैं। अब सोचिये कि जब महंगाई माउंट एवरेस्ट को छूने पर आमादा हो, उस समय ६०० से भी कम में महीने का गुजारा कैसे मुमकिन होगा। क्या लोगों की बेचैनी, उनकी बेबसी ने कभी प्रधानमंत्री के आंखों से उनकी रातों की नींद चुरायी है। क्या कभी उन्होंने सोचा है कि भारत माता ग्राम वासिनी वाले हिंदुस्तान में गांव बदहाली और तंगी का दूसरा नाम बन चुके हैं और विषमता अंग्रेजों के जमाने से भी ज्यादा बढ़ गयी है। दूसरी तरफ देश में अरबपतियों-खरबपतियों की संख्या बढ़ती जा रही है और उसे एक शक्तिशाली भारत का नाम दिया जा रहा है। आखिर ये विषमता विद्वान और ईमान वाले प्रधानमंत्री की साख और सम्मान में बट्टा नहीं लगाती।&lt;br /&gt;कहते हैं कि पहली मर्तबा हरियाणा के मुख्यमंत्री बनने के बाद वंसीलाल ने अपने दफ्तर में राज्य का मानचित्र देखकर बड़े बड़े अफसरों को बुलाया। उनसे पूछा कि नक्शे पर हरे रंग का क्या मतलब है, सफेद रंग का क्या अर्थ निकलता है और ये लाल रंग क्या इंगित करता है। अधिकारियों ने बताया कि हरा रंग बताता है कि राज्य का वो इलाका सिंचाई के साधनों से भरा है और वहां अच्छी फसल होती है। मुख्यमंत्री ने फरमान सुनाया कि बहुत जल्द ही पूरे नक्से को हरा करके दिखाओ। अधिकारियों के हाथ पांव फूल गये, उन्होंने कहा कि ये इतनी जल्द मुमकिन नहीं। लेकिन वंसीलाल टस से मस नहीं हुए और आखिरकार लाल फीताशाही के आदी हो चुके अफसरों को जी जान से काम में जुट जाना पड़ा। वंसीलाल की गिनती मनमोहन सिंह की तरह निपट ईमानदार नेता में नहीं होती लेकिन उनकी दृढ़ता ने वो करवा दिया, जिस पर अफसर नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। क्या प्रधानमंत्री वैसा कर सकते हैं?&lt;br /&gt;नहीं कर सकते। आखिर उसी अफसरशाही की उपज ये भी हैं और इसीलिए बाबुओं के बूते ही देश का भला होते देखना चाहते हैं। अगर वैसा हो जाता, तो इसमें कोई बुराई नहीं थी लेकिन ऐसा दिखता नहीं। आखिर बाबुगिरी का ही तो असर था, जो तीन साल पहले ब्रिटेन जाकर प्रधानमंत्री जी ने अंग्रेजों की तारीफ में ये कह दिया कि अगर आप नहीं आए होते तो हम ना तो अनुशासित हो पाते, ना ही सभ्य। ये बयान था उस देश के प्रधानमंत्री का, जो अपने पांच हजार साल की सभ्यता को भूल गये थे और उनकी तारीफ कर रहे थे, जिन्होंने दो सौ साल तक इस देश को रौंदा था। वो तो एक अधनंगे फकीर का पराक्रम काम कर गया, नहीं तो प्रधानमंत्री जैसे लोग उन्हीं अंग्रेजों के राज में हाइली-पेड बाबू होते।&lt;br /&gt;लोकतंत्र सही मायने में तभी निखरकर आता है, जब उसका नेता लोगों की तरफ से चुना होता है। लेकिन मनमोहन सिंह तो चुनाव लड़ना ही नहीं जानते। जिस जनता के नाम पर घड़ियाली आंसू बहाते हैं, उनके बीच जाकर उनसे जनमत मांगने में ही डर लगता है। और ले देकर एक बार १९९९ में दक्षिण दिल्ली से लोकसभा का चुनाव लड़ा था। तब प्रचार के दौरान बार बार ये दुहाई देते थे कि अगर चुनाव नहीं जीते तो राज्य सभा से इस्तीफा दे देंगे। लोगों ने सोचा कि चलो, आजमाकर देख ही लेते हैं। मनमोहन सिंह को हरा दिया। इन्होंने इस्तीफा नहीं दिया, बल्कि राज्यसभा के उसी गलियारे से उठाकर सोनिया गांधी ने इन्हें प्रधानमंत्री बना दिया।&lt;br /&gt;लोकतंत्र का इससे बड़ा मजाक नहीं हो सकता कि लोकतांत्रिक तरीके से चुने गये प्रधानमंत्री की जगह एक नियुक्त प्रधानमंत्री हुकूमत चला रहा है। चूंकि हमारा अभिजात वर्ग अंग्रेजों के जमाने के बाबूगीरी और नौकरशाही के संस्कार से बाहर नहीं निकला है, लिहाजा मनमोहन सिंह उनके मन को मोह लेते हैं। लेकिन बात इतने पर ही नहीं रुकती। अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु करार को लेकर प्रधानमंत्री ने जिस तरह की हठधर्मिता दिखायी है, उसका मकसद क्या है। क्या ये इतना महत्वपूर्ण सवाल था कि जिन कम्युनिस्टों के बूते चार साल से ज्यादा वक्त तक आपकी सरकार खींच गयी, उन्हें मसौदा तक नहीं दिखाया। आखिर जिद, गुस्सा, झल्लाहट और राष्ट्रीय सरोकारों को परे ढकेल कर खुद को अमेरिकापरस्त बनाने की ये मानसिकता देश को कहां ले जाएगी।&lt;br /&gt;अब ये हमारा आपका दुर्भाग्य है या सौभाग्य... ये सोच लीजिए।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/651389203414988846-4061542632400815906?l=alaaw.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://alaaw.blogspot.com/feeds/4061542632400815906/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=651389203414988846&amp;postID=4061542632400815906' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/4061542632400815906'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/4061542632400815906'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://alaaw.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='ये आपके इमानदार प्रधानमंत्री हैं !'/><author><name>Bichitra Mani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04287910528808991198</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_ApQTeWPA9wc/SIGniJAah0I/AAAAAAAAAAc/ntyTUtfCno0/s72-c/manmohan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-651389203414988846.post-3020658556596325388</id><published>2008-06-07T12:39:00.000-07:00</published><updated>2008-06-07T12:44:08.403-07:00</updated><title type='text'>गलती करे जोलहा, मार खाये गदहा</title><content type='html'>थोडे असमंजस, थोड़ी ना-नुकूर और थोड़ी फुसफुसाहट के साथ ही सरकार ने पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोत्तरी कर ही दी। कितना किया, अब उस दुखती रग को छेड़ने से क्या फायदा। लेकिन सरकार के फैसले ने विपक्ष को तो छेड़ ही दिया। सरकार को समर्थन देने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां उस लैला की तरह हो गयीं, जो जमाने के आगे तो मजनूं को भला बुरा कहती है लेकिन दुनिया की आड़ में उनका प्रेमालाप बदस्तूर जारी रहता है। आखिर क्या करें, खुद को जब कम्युनिस्ट कहना है तो जनवादी तो दिखना ही पड़ेगा। हों या ना हों, इसके क्या फर्क पड़ता है। इसे लोकतंत्र की बदनसीबी ही कहेंगे कि यहां कुछ करने से ज्यादा कुछ क दिखाने का ढिंढोरा ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। बेचारी कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी कोलकाता में बंद रखकर ये मान लिया कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ोत्तरी पर उसने अपना कर्तव्य निबाह लिया। उन्हें ये नहीं दिखता कि पेट्रोलियम पदार्थों पर आंध्र प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा बिक्री कर पश्चिम बंगाल सरकार ही लगाती है, जहां लाल क्रांति वाले कम्युनिस्टों का परचम बीते ३१ साल से लहरा रहा है।&lt;br /&gt;लेकिन सबसे नाटकीय और अमानवीय विरोध रहा भारतीय जनता पार्टी का।&lt;br /&gt;भाजपा नेता वेंकैय्या नायडू ने बैलगाड़ी की सवारी की तो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने मंत्रियों के साथ साइकिल पर चलते दिखे। हद तो भाजपा की एक व्यापारिक शाखा ने कर दी। उसने मारुति ८०० कार को दो गधों से जोत दिया। बेचारे गधे तथाकथित इंसानों&lt;br /&gt;के बीच हक्के बक्के कार को खींच रहे थे। वो मन में सोच रहे होंगे कि गलती तो मनमोहन सिंह और मुरली देवड़ा की है, खामियाजा हम भुगत रहे हैं।&lt;br /&gt;आखिर उन गधों की गलती क्या थी? आपको कार पर चलना है या नहीं चलना है, उससे गधों और बैलों का क्या लेना-देना। सरकार के पेट्रोल डीजल की कीमतें बढ़ाने से आप कार से उतरकर बस या पैदल हो गये, उसमें उन निरीह पशुओं की क्या गलती है। गधे और बैल तो सही मायने में श्रम के प्रतीक हैं। इस खेती प्रधान देश में उनकी बड़ी जरूरत है। निश्छलता, कर्मठता और स्वामिभक्ति की उनकी प्रवृति का आदर किया जाना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि देश-भक्ति की ढोल पीटने वाली बीजेपी उन महान मूल्यों की कीमत नहीं जानती। वक्त के मुताबिक एक प्रचलित कहावत को बदलकर कहें तो गलती तो जोलहा ने किया, मार बेचारा गदहा खा रहा है।&lt;br /&gt;वजह साफ है कि उस हवा हवाई पार्टी में जमीन का दुख-दर्द समझने वाला कोई नहीं है। कायदे से तो उम्र के आखिरी पड़ाव पर ही सही, बीजेपी के प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी को चाहिए कि खेती-बाड़ी वाले इस देश को ठीक से जानने की कोशिश करें और हो सके तो वेंकैय्या नायडू और दूसरे अपने नेताओं को भी ये नेक सलाह दें। वैसे एक बात और जोड़ दूं कि ये बात कांग्रेस पर भी लागू होती है। आखिर भाजपा कांग्रेस का ही तो विस्तार है। कैसे? इसकी चर्चा बाद में होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/651389203414988846-3020658556596325388?l=alaaw.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://alaaw.blogspot.com/feeds/3020658556596325388/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=651389203414988846&amp;postID=3020658556596325388' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/3020658556596325388'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/3020658556596325388'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://alaaw.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='गलती करे जोलहा, मार खाये गदहा'/><author><name>Bichitra Mani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04287910528808991198</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-651389203414988846.post-820262603359812591</id><published>2007-11-09T05:26:00.000-08:00</published><updated>2007-11-09T05:28:33.851-08:00</updated><title type='text'>किसकी दिवाली, किसका दिवाला</title><content type='html'>आज दिवाली है। उत्साह और उल्लास का त्यौहार। बेबसी, निराशा और तनाव के बीच खुशियों के समुच्चय का प्रतीक दिवस। कहते हैं कि भगवान राम जब लंका विजय के बाद अयोध्या लौटे तो अवधवासियों ने अपने मर्यादा के पुरुषोत्तम के आने के मौके पर घी के दीये जलाए थे। तभी से रोशनी का ये त्यौहार मनाया जाता है। इस उम्मीद के साथ कि साल का एक दिन अंधकार पर प्रकाश का, अशुभ पर शुभ का और दासता पर स्वतंत्रता का संदेश लेकर लोगों के मानस में पैठ जाए। लेकिन वक्त के साथ दिवाली की शक्ल बदल गयी है। जो जितने अंधकार का शिकार है, वो उजाले का उतना ही बड़ा ठेकेदार बना बैठा है। मानवता के अभिशापी खुशियों के पैगाम बांट रहे हैं और पटाखों के धूम धड़ाके में दिवाली की वह शालीनता और गरिमा मारी जा रही है, जिसका पैरोकार खेतिहर समाज रहा है। आखिर दिवाली किसानों के लिए उजाले का त्यौहार ना होकर लक्ष्मीपुत्रों के लिए जश्न और दिखावे का जरिया बन गयी है।&lt;br /&gt;दस साल से देश की राजधानी दिल्ली की दिवाली देखते देखते अनायास बचपन और गांव की दिवाली याद आ जाती है। वहां पटाखों के शोर-शराबे नहीं होते, मिट्टी के साफ सुथरे दीयों में सरसों के तेल से पूरे वातावरण को रौशन किया जाता है। उस रात की अगली सुबह सूरज के किरणों के फूटने से पहले औरत और बच्चे सूप बजाते यही राग गाते हैं- इस्सर पइठन, दरिद्दर निकलन। इसके साथ ही ये इंतजार शुरु हो जाता है कि अगला साल लोगों की जिंदगी में दरिद्रता का नहीं, समृद्धि का संदेश लेकर आएगा। पूरा साल इसी उम्मीद, इसी आस में गुजर जाता है। लेकिन ना तो ईश्वर आते हैं और ना ही लक्ष्मी ही बेबस, विपन्न लोगों को पूछने जाती हैं। तमाम कड़वाहटों के बीच दरिद्रता पहले से कहीं ज्यादा कुटिल अट्टहास करती है। क्या दिवाली के मौके पर ये नहीं पूछा जाना चाहिए कि वैभव की लक्ष्मी के हाथ पैर बांधकर क्यों चंद लोगों की तिजोरी में कैद रखा गया है। आखिर इसी समाजवादी और कल्याणकारी राज्य वाले देश में लाल झंडे वालों के सहारे हुकूमत चलाने वाले और गांधी के नाम का जाप करने वाले बड़े गुमान से इतराते कहते फिरते हैं कि देश में २३ हजार ऐसे लोग हैं, जो करोड़पति हैं। लेकिन बेशर्मी और असंवेदना में आपादमस्तक डूबी सरकार ये बताने का जहमत नहीं उठाती कि भूख से तड़पकर दम तोड़ देने वालों की तादाद कितनी है। देश के कुछ समझदार अर्थशास्त्रियों ने एक रपट तैयार की है कि एक अरब २५ करोड़ की आबादी वाले इस देश में करीब ८४ करोड़ लोग ऐसे हैं, जो हर रोज बीस रुपये कमा पाते हैं। दूसरी तरफ २० हजार के पार कुंलाचे मारते शेयर बाजार के रथ पर सवार चंद लोगों के लिए लाखों रुपये हर रोज लुटा देना बाएं हाथ नहीं, बल्कि बाएं हाथ की कानी उंगली का खेल है। क्या विषमता और शोषण की विस्फोटक बुनियाद पर टिके इस देश को दिवाली मनाने का हक है, जहां किसान और खेतिहर मजदूरों का दिवाला निकलता हो।&lt;br /&gt;आखिर हमारी आपकी दिवाली को गुलजार करने वाले इसी देश में शिवकासी से लेकर मुंबई तक लाखों नाबालिग बच्चे पटाखों की फैक्टरियों में अपनी जान जोखिम में डालकर काम करते हैं। उनके मां बाप जानते हैं कि उनके बच्चों की जिंदगी में कोई सुनहरा सवेरा शायद ही आए। लेकिन हम आप कहां सोचते हैं कि जब हमारे आपके बच्चों सरीखे ही उन बच्चों का बचपन पीसा जाता है, तो उन पटाखों के मसाले तैयार होते हैं, जिनमें हमारी खुशियों, हमारी अल्हड़ उमंगों का वास होता है। क्या एक संवेदनशील समाज में हम उन बच्चों के विषय में सोच पाते हैं।&lt;br /&gt;बहुत पहले हमारे पुरखों ने कहा था- बेबसी और उदासी में दिवाली क्या, नहीं तो सदा दिवाली संत घर। आखिर संतों को शासकों पर तरजीह देने वाले इस देश में विषमता की दिवाली कब खत्म होगी, थोड़ा वक्त मिले तो इसके बारे में सोच लीजिए। शायद अपनी छोटी छोटी खुशियों के लिए सामाजिक सपनों से खुद को काट लेने की दुखद मानसिकता का कुछ तो प्रायश्चित हो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विचित्रमणि&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/651389203414988846-820262603359812591?l=alaaw.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://alaaw.blogspot.com/feeds/820262603359812591/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=651389203414988846&amp;postID=820262603359812591' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/820262603359812591'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/820262603359812591'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://alaaw.blogspot.com/2007/11/blog-post_09.html' title='किसकी दिवाली, किसका दिवाला'/><author><name>Bichitra Mani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04287910528808991198</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-651389203414988846.post-6842715565379778550</id><published>2007-10-05T00:10:00.000-07:00</published><updated>2007-10-05T00:11:52.490-07:00</updated><title type='text'>गांधी को इतना मत छलो</title><content type='html'>एक थे देवीलाल। वीपी सिंह जैसे तेजतर्रार और चंद्रशेखर जैसे बेबाक प्रधानमंत्रियों के तहत उप प्रधानमंत्री थे। १९८९ में जब वीपी सिंह की अगुवाई वाली सरकार में उप प्रधानमंत्री बनने से पहले वो हरियाणा के मुख्यमंत्री थे। लेकिन जब केंद्रीय राजनीति में आए, तो अपने लाडले ओम प्रकाश चौटाला को सूबे की कमान दे दी। जब हो हंगामा मचा, तो बड़े तपाक के साथ कह दिया- जब लोहार का बेटा लोहार, सोनार का बेटा सोनार, किसान का बेटा किसान तो मुख्यमंत्री का बेटा मुख्यमंत्री क्यों नहीं हो सकता। क्या मासूम तर्क था! देवीलाल ने इस तर्क के साये में अपनी भ्रष्टता, वंशवाद और पुत्र मोह को ढंकने की कोशिश तो कर ली लेकिन शायद ही कोई होगा, जिसे देवीलाल के इस तर्क में तार्किकता नजर आई हो। आखिर किसान के दर्द और मुख्यमंत्री की रईसी में आकाश पाताल का फर्क होता है।&lt;br /&gt;देवीलाल वाकई सीधे सादे इंसान थे। वो गांव देहात की धूल धक्कड़ से निकलकर सियासी आसमान पर चमके थे। पुत्रमोह ने उन्हें वंशवाद का पोषक बना दिया लेकिन गांव वाली सादगी उन्हें सियासी धूर्तता से जोड़ नहीं पाती थी। दूसरे होते तो कहते कि नहीं, जनता ने ही मेरे बेटे या बेटी को सेवा करने के लिए भेजा है। हम तो जनता के जन्मजात सेवक हैं। यकीन ना हो तो कांग्रेस और भाजपा की तरफ देख लीजिए। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह को भारतीय जनता युवा मोर्चा की यूपी शाखा का अध्यक्ष बना दिया गया लेकिन नैतिकता की दुहाई देते हुए उन्होंने पद लेने से मना कर दिया। इससे पहले बीते विधानसभा चुनाव के दौरान भी बीजेपी ने उन्हें वाराणसी के पास चिरईगांव से विधानसभा चुनाव के लिए टिकट दिया था, लेकिन ऐन मौके पर उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया। अपने बेटे की तारीफ करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा था कि ऐसी औलाद तो ईश्वर हर इंसान को दे। लेकिन इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं था कि आखिर उनके बेटे में ऐसे क्या सुरखाब के पर लगे थे, जो बिना कुछ किये धरे उनका राजतिलक हो जाता। देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष होने के बावजूद राजनाथ की राजनीतिक हैसियत बड़ी छोटी है। उनके जनाधार का आलम ये है कि अगर राज्यसभा का प्रावधान नहीं होता, तो बेचारे संसद का मुंह तक नहीं देख पाते। लिहाजा अपने बेटे को आसमान चढ़ाने की हर कोशिश उनके ही मुंह पर आ गिरी। लेकिन पिछले दिनों कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने सपूत राहुल गांधी को पार्टी महासचिव बना दिया। युवराज की ताजपोशी हो गयी और चारण परंपरा में माहिर कांग्रेसियों ने समवेत स्वर में राहुल राग अलापना शुरु कर दिया।&lt;br /&gt;इसके साथ ही ये फिजा बनने लगी कि थके हारे बूढ़ों का जमाना खत्म हो गया और अब राजनीति में युवाओं का दौर शुरु हो गया। क्या राहुल गांधी ही इस देश में युवाओं के प्रतीक पुरुष हैं? आखिर युवा राजनीति का मतलब क्या है? क्या सिर्फ उम्र से ही तय होगा कि राजनीति कितनी जवान है? खेल के लिए तो शारीरिक उम्र की अहमियत समझ में आती है लेकिन राजनीति के लिए उम्र का सीधा वास्ता अनुभव और समझ से होता है। अगर ऐसा नहीं होता तो २३ साल पहले ४१५ की बहुमत लेकर प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी तो देश में राम राज्य ला दिये होते। लिहाजा ३९ साल की उम्र में कांग्रेस के महासचिव बनने वाले राजीव गांधी के बेटे राहुल गांधी अगर ३७ साल में उसी पद पर काबिज होते हैं तो ये उनका नैसर्गिक गुण नहीं बल्कि उनके माथे पर लगा उनका खानदान का टैग है। हो सकता है कि खानदार के रथ पर सवार होकर एक दिन वे देश के प्रधानमंत्री भी बन जाएं लेकिन देश का क्या गत बनेगी, इसके बारे में भी सोच लीजिए।&lt;br /&gt;ये सारे सवाल और सारी आशंकाएं इसलिए उठ रही हैं कि सोनिया गांधी इन दिनों महात्मा गांधी पर भाषण दे रही हैं। सड़क से लेकर संसद और संसद से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ तक। लेकिन गांधी ने तो कभी वंशवाद को नहीं बढ़ाया। उनका एक इशारा उनके किसी बेटे को किसी भी बड़े पद पर बिठा सकता था और बडे बड़ों की राजनीति को धूल में भी मिला सकता था। गांधी ने ऐसा नहीं किया तो इसलिए कि वे वंशवाद के जहर और देश पर पड़ने वाले उसके असर से भलीभांति वाकिफ थे। क्या दो अक्टूबर यानी गांधी की जयंती के मौके पर ऊंचे सिद्धांत बघारने वाली सोनिया हमारे महान राष्ट्रपिता की करनी पर भी ध्यान देंगी। सवाल ऐसा है कि सोनिया गांधी तो छोड़िये, कांग्रेसी भी इससे मुंह छुपाते दिखेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/651389203414988846-6842715565379778550?l=alaaw.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://alaaw.blogspot.com/feeds/6842715565379778550/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=651389203414988846&amp;postID=6842715565379778550' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/6842715565379778550'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/6842715565379778550'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://alaaw.blogspot.com/2007/10/blog-post.html' title='गांधी को इतना मत छलो'/><author><name>Bichitra Mani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04287910528808991198</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-651389203414988846.post-3544777777411322245</id><published>2007-09-27T03:10:00.000-07:00</published><updated>2007-09-27T03:12:22.242-07:00</updated><title type='text'>ज़िंदा हैं भगत सिंह</title><content type='html'>जीवन के प्रति सकारात्मक सोच हमारी परंपरा का हिस्सा रही है। आखिर हमारे पूर्वजों ने यूं ही नहीं कहा था कि जीवेत शरदं शतक। यानी सौ साल की जिंदगी। पुरखों की आजमायी कसौटी पर कस कर देखें तो भगत सिंह अगर आज होते, तो वे पूरे सौ साल के होते। लेकिन जिस उम्र में हम आप मधुर सपनों में खोए रहते थे, उस अवस्था में उन्होंने जो धमाका किया, उसकी गूंज आने वाली पीढ़ियां भी बड़े गर्व से सुनती रहेगी। उसमें त्याग का संगीत सजता है, उससे राष्ट्रप्रेम की धुन निकलती है और समाजवाद के गीत बजते हैं। २३ मार्च १९३१ को जब उन्होंने फांसी के फंदे को चूमा था, तब उनकी उम्र २३ साल, पांच महीने और २५ दिन की थी। लेकिन उतनी अल्पायु में ही भगत सिंह ने समाज को समाजवाद का पाठ पढ़ाया, अंग्रेजियत में पले बढ़े जालिम जमाने को बम के गीत सुनाए और पलायन को पीछे छोड़ते हुए मृत्यु का जिस तरह वरण किया, क्या उस कालजयी मौत पर लाखों जिंदगियां कुर्बान नहीं की जा सकती हैं? भगत सिंह ने वही किया। उनकी क्रांतिकारी जिंदगी ने समाज को जितना उद्वेलित किया था, उनकी शहादत भरी मौत ने उससे कहीं ज्यादा सिस्टम को झकझोरा। अस्सी साल गुजर गये, जब उन्होंने खुद के नास्तिक होने का खुला ऐलान किया था और आजादी के अफसाने को उपेक्षितों-वंचितों के मौलिक अधिकारों से जोड़ा था। क्या उन सपनों के लिए ही भगत सिंह को याद नहीं किया जाना चाहिए?&lt;br /&gt;हम भगत सिंह को इसलिए नहीं याद कर रहे हैं कि उनके सौ साल पूरे हो गये। जन्म मृत्यु का आंकड़ा तो आता जाता रहता है। भगत सिंह जैसे अपनी फांसी के समय ७६ साल पहले थे, वैसे ही आज भी हैं और सौ साल बाद भी रहेंगे। लिहाजा आज भगत सिंह को याद करने का एक बड़ा मकसद गांधी से उन्हें जोड़ना भी है। अगर इस लेखक से पूछा जाए तो इसकी नजर में महात्मा गांधी की शख्सियत भगत सिंह से काफी ऊंची नजर आती है। बावजूद इसके अगर हम भगत सिंह से अपनी बात की शुरुआत कर रहे हैं तो इसलिए कि तमाम नकारों के बावजूद गांधी को बहुत हद तक सम्मान मिला, उन्हें सरकारी अमला भी याद करने की रस्मअदायगी कर लेता है। लेकिन इस स्वार्थी जगत को भगत की याद नहीं आती। बम की बोली को किनारे कर दें और ईश्वर को लेकर दोनों की राय को हमसाया ना करें तो क्या फर्क है गांधी और भगत में। जिस समय भगत सिंह का जन्म हुआ था, गांधी की उम्र ३८ साल थी। गांधी तब तक दक्षिण अफ्रीका में एक सफल आंदोलन का नेता बनकर उभर चुके थे। बाद में भारत आने पर गांधी ने आजादी को समाज के आखिरी आदमी से जोड़ा। धन के असमान वितरण के खिलाफ लिखा, बोला और कथनी को करनी में उतार कर दिखाया। ईश्वर में आस्था जरूर थी लेकिन मंदिरों में मत्था टेकने या किसी मजार पर घी के चिराग जलाने के लिए गांधी नहीं जाते थे। बल्कि ईश्वर को पाने के लिए उन्होंने कर्तव्य पथ पर खुद को जलाया था। खुद को जलाकर मोहनदास ने जिस गांधी को समाज के लिए निकाला, क्या उसकी खुशबू आज भी फिजाओं में घुली हुई नहीं है। दक्षिण अफ्रीका से हिंदुस्तान आने के बाद अपने पहले सार्वजनिक भाषण में गांधी ने कहा था कि अपने मन का भय निकाल दो, दुनिया की कोई ताकत तुम्हें परास्त नहीं कर सकती। समाज को निर्भयता का पाठ पढ़ाया, डरने वाले समाज को निडर बनाया। क्या भगत सिंह भी उस रास्ते पर नहीं चले थे? आखिर भगत सिंह ने सेंट्रल एसेंबली में बम फेंकने के बाद यही कहा था ना कि ये धमाका बहरी हुकूमत को अपनी आवाज सुनाने के लिए किया गया है। लेकिन उस धमाके के पीछे भगत सिंह का मकसद किसी बेगुनाह का खून बहाना नहीं था। उन्हें अंग्रेजी शासन का खात्मा करना था, उसके लिए उनसे जो बन पड़ा, उन्होंने किया। उन्होंने हिंसा का रास्ता अख्तियार किया लेकिन वकालत हमेशा अहिंसा की करते रहे। उन्होंने समाजवाद का नारा दिया लेकिन गांधी के लिए उनके मन में मार्क्स से कहीं ज्यादा सम्मान था। ये क्या सिर्फ इत्तफाक है कि भगत सिंह की शहादत के साढ़े ग्यारह साल बाद जब गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन छेड़ा तो नारा दिया- करो या मरो। जो बात गांधी ने उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंचकर कही, भगत सिंह ने भरी तरुणाई में उस अंगड़ाई का आगाज कर दिया था।&lt;br /&gt;गांधी पर ये आरोप अक्सर लगता है कि उन्होंने भगत सिंह को बचाने की कोशिश नहीं की। ये कुछ ऐसे कहा जाता है मानो गांधी का वचन तो अंग्रेजों के लिए देववाणी होता। लोग क्यों भूल जाते हैं कि गांधी के बेहद गरिमामय व्यक्तित्व के बावजूद अंग्रेज उनसे नफरत करते थे और ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल तो कहते थे- ये बुड्ढा बहुत चालाक है। याद कीजिए आपके राष्ट्रपिता के लिए ब्रिटिश नेता कैसे शब्दों का इस्तेमाल करते थे, बावजूद इसके कि नेहरू जैसे नेताओं के चर्चिल परम मित्र भी बने रहे। विषयांतर ना हो, लिहाजा फिर इस बात पर लौटते हैं कि जब भगत सिंह को फांसी की सजा हुई, तो गांधी ने क्या किया। गांधीजी ने १८ फरवरी १९३१ को तत्कालीन वायसराय से बातचीत में कहा- फिलहाल आप फांसी की सजा को टाल दें तो मैं उनको (क्रांतिकारियों को) हिंसा का मार्ग छोड़ने के लिए तैयार करूंगा। भगत सिंह बहादुर तो है ही लेकिन उसका दिमाग ठिकाने नहीं है यानी वो हिंसा के मार्ग पर चला गया है। मैं उसके साथियों को समझाने का प्रयास कर रहा हूं।&lt;br /&gt;इतना ही नहीं, भगत सिंह की शहादत के बाद कराची कांग्रेस में जब गांधी भाषण देने पहुंचे, तो उनसे सवाल पूछा गया- भगत सिंह को बचाने के लिए आपने क्या किया। जवाब में गांधी ने कहा- मैं वायसराय को जिस तरह समझा सकता था, उस तरह समझाया। समझाने की जितनी शक्ति मुझमे थी, सब मैंने उनपर आजमाकर देखी। भगत सिंह के परिवार वालों के साथ निश्चित आखिरी मुलाकात के दिन अर्थात २३ मार्च को सवेरे मैंने वायसराय को व्यक्तिगत तौर पर एक खत लिखा। उसमें मैंने अपनी सारी आत्मा उड़ेल दी थी, लेकिन सब बेकार गया। आप कहेंगे कि मुझे एक बात और करनी चाहिए थी- सजा को घटाने के लिए समझौते में एक शर्त रखनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा हो नहीं सकता था।&lt;br /&gt;अब आप बताइए, अपने अहिंसा मार्ग पर डटे रहने वाले गांधी के लिए भगत सिंह को बचाने का और क्या उपाय हो सकता था। लेकिन ये सवाल क्यों गोल कर दिया जाता है कि क्या खुद भगत सिंह के लिए भी भीख से मिली जिंदगी अपमानजनक नहीं होती।&lt;br /&gt;बेशक मेरा मकसद गांधी और भगत सिंह में तुलना करना नहीं है। बल्कि ये बताना है कि दोनों के राग भले जुदा रहे, लेकिन अंदर तो एक ही आग जलती रही। क्या आज भी उसी आग को जिंदा रखने की जरुरत नहीं है? तो उसी आग को धधकाए रखने के लिए ये अलाव हाजिर है। भगत सिंह का जन्मदिन २८ सितंबर है। गांधी का २ अक्टूबर। तो बस भगत सिंह से चलना शुरु कीजिए और चार डेग भरेंगे कि गांधी मिल जाएंगे। आखिर उन दोनों के बगैर भारत कैसे बनेगा और कैसे जलेगा समाजवाद का अलाव?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/651389203414988846-3544777777411322245?l=alaaw.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://alaaw.blogspot.com/feeds/3544777777411322245/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=651389203414988846&amp;postID=3544777777411322245' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/3544777777411322245'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/651389203414988846/posts/default/3544777777411322245'/><link rel='alternate' type='text/html' 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